भाजपा ने राज्यसभा के लिए धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार को उम्मीदवार बनाया है। उम्मीदवारों की सामाजिक पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो सूची में पिछड़ा वर्ग, दलित, ब्राह्मण और ठाकुर समुदायों का संतुलन दिखाई देता है। धर्मपाल सिंह को लोधी/OBC पृष्ठभूमि से जोड़ा जाता है, जबकि प्रकाश पाल भाजपा के OBC संगठन से जुड़े प्रमुख चेहरे हैं। श्रुति गंगवार के जरिए महिला और पिछड़ा वर्ग प्रतिनिधित्व का संदेश दिया गया है।
विद्यासागर सोनकर और प्रियंका सिंह रावत दलित प्रतिनिधित्व का हिस्सा हैं। वहीं राधाकांत ओझा और गोपी कृष्ण पांडेय ब्राह्मण चेहरों के रूप में सामने आते हैं। राम प्रताप सिंह चौहान ठाकुर/राजपूत प्रतिनिधित्व करते हैं। इस तरह आठ नामों की सूची को केवल राज्यसभा टिकटों का बंटवारा मानना मुश्किल है। इसमें 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सामाजिक समीकरण को संतुलित रखने की कोशिश भी दिखाई देती है।
बड़े चेहरों की जगह संगठन को तरजीह
भाजपा की सूची की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि मौजूदा राज्यसभा सांसदों और केंद्रीय स्तर के चर्चित चेहरों में से कुछ को इस बार दोबारा मौका नहीं मिला। हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा को उम्मीदवार नहीं बनाया गया है। इसके बजाय उत्तर प्रदेश की राजनीति और संगठन में सक्रिय नेताओं को आगे किया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि राज्यसभा की सीटों के जरिए पार्टी ने उत्तर प्रदेश के अपने संगठनात्मक ढांचे और सामाजिक प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता दी है।
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा के सामने सामाजिक समीकरण को लेकर जो चुनौती सामने आई थी, उसके बीच राज्यसभा उम्मीदवारों की यह सूची महत्वपूर्ण हो जाती है। पिछड़े और दलित समुदायों को प्रतिनिधित्व देने के साथ पार्टी ने ब्राह्मण और ठाकुर चेहरों को भी सूची में जगह दी है।
भाजपा के सामने आठवीं सीट का गणित
403 सदस्यीय विधानसभा में राज्यसभा की एक सीट के लिए 37 प्रथम वरीयता वोट की जरूरत है। मौजूदा संख्या बल में भाजपा सात सीटें जीतने की स्थिति में है। भाजपा के सहयोगी दलों और उपलब्ध अतिरिक्त समर्थन को जोड़ने पर NDA की प्रभावी संख्या करीब 294 मानी जा रही है। आठ सीटों के लिए 296 वोट चाहिए। यानी आठवीं सीट के लिए करीब दो अतिरिक्त वोटों की जरूरत है। भाजपा का आठ उम्मीदवार उतारना इसी गणित का संकेत है। पार्टी सात सीटों के सुरक्षित आधार से आगे बढ़कर आठवीं सीट के लिए भी मैदान में है। अब नजर उन अतिरिक्त वोटों पर होगी जो आठवीं सीट का रास्ता पूरा कर सकते हैं।
सपा के सामने तीसरी सीट की मुश्किल
समाजवादी पार्टी ने रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी को उम्मीदवार बनाया है। सपा के मौजूदा संख्या बल के आधार पर दो सीटों के लिए जरूरी 74 वोट जुटाना उसके लिए संभव है। लेकिन तीसरी सीट का गणित अलग है। दो उम्मीदवारों के लिए 74 वोट देने के बाद करीब 29 वोट बचते हैं। तीसरी सीट जीतने के लिए 37 वोट चाहिए। यानी सपा को करीब 8-9 अतिरिक्त वोट जुटाने होंगे। यहीं से चुनाव में असली राजनीतिक जोड़-तोड़ शुरू होगी। सपा यदि तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो उसे अपने खेमे से बाहर अतिरिक्त समर्थन हासिल करना होगा। दूसरी तरफ भाजपा को भी आठवीं सीट के लिए दो अतिरिक्त वोटों की तलाश होगी।
नौ सीटों का आधार साफ, दसवीं पर मुकाबला
मौजूदा संख्या बल को देखें तो भाजपा/NDA की सात और सपा की दो सीटों का आधार अपेक्षाकृत स्पष्ट है। इसलिए असली राजनीतिक मुकाबला दसवीं सीट पर केंद्रित होता दिखाई दे रहा है। भाजपा के लिए यह आठवीं सीट है तो सपा के लिए संभावित तीसरी। भाजपा को जहां दो अतिरिक्त वोटों की जरूरत है, वहीं सपा को तीसरी सीट के लिए 8-9 अतिरिक्त वोटों का इंतजाम करना होगा। इस गणित में छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। साथ ही दोनों खेमों में संभावित क्रॉस-वोटिंग की चर्चा ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।
राज्यसभा चुनाव से निकलेगा 2027 का संदेश
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि इसके कुछ ही महीनों बाद 2027 का विधानसभा चुनाव होना है। भाजपा ने आठ उम्मीदवारों के चयन में जिस तरह विभिन्न सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व दिया है, उससे उसके चुनावी सामाजिक संतुलन की दिशा का संकेत मिलता है। सपा के सामने दूसरी चुनौती है। दो सीटों के बाद तीसरी सीट के लिए उसे अपने मौजूदा संख्या बल से बाहर जाकर समर्थन जुटाना होगा। ऐसे में राज्यसभा का यह चुनाव केवल उच्च सदन की सीटों का चुनाव नहीं रह गया है।
भाजपा ने आठ उम्मीदवार उतारकर आठवीं सीट के लिए दो अतिरिक्त वोटों का गणित सामने रख दिया है। सपा के सामने दो सीटों के बाद तीसरी सीट के लिए 8-9 वोटों का सवाल है। अब देखना यह है कि दसवीं सीट के लिए कौन अपने अतिरिक्त वोटों का जुगाड़ बेहतर तरीके से कर पाता है। यही मुकाबला 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में बदलते सामाजिक समीकरणों और राजनीतिक ताकत का एक अहम संकेत बन सकता है।
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