विशिष्ट अतिथियों में पंजाबी विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति डॉ. जसपाल सिंह, लेखक, संपादक एवं राष्ट्रमंडल पत्रकार संघ के प्रेसिडेंट एमेरिटस महेंद्र वेद तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा एवं साहित्य अध्ययन विभाग के अध्यक्ष प्रो. रवि टेकचंदानी शामिल रहे। जनपद संपदा प्रभाग के अध्यक्ष प्रो. के. अनिल कुमार ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। इस चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार रेहान फ़ज़ल ने भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने विभाजन से सम्बंधित इतिहास, स्मृति और समकालीन विमर्श के बीच संबंधों पर भी चर्चा की।
इस अवसर पर पुस्तक के लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री विवेक शुक्ला ने पुस्तक की विषयवस्तु, लेखन की पृष्ठभूमि और विभाजन से जुड़े उन प्रश्नों पर प्रकाश डाला, जो दशकों बाद भी भारतीय समाज की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बने हुए हैं। विवेक शुक्ला ने अपनी रचना प्रक्रिया और शोध अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि 1947 का विभाजन सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और लोक-स्मृतियों का ऐसा अध्याय है, जिसके कई सवाल आज भी हमारे सामूहिक विमर्श में शेष हैं।
अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि वर्ष 1947 का विभाजन भारतीय इतिहास की ऐसी त्रासद घटना है, जिसके प्रभाव केवल राजनीतिक सीमाओं के पुनर्निर्धारण तक सीमित नहीं रहे। इसके सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय प्रभावों को समझना आज भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विभाजन से जुड़े प्रश्नों पर निरंतर संवाद और गंभीर अध्ययन हमारी ऐतिहासिक समझ को अधिक व्यापक बनाते हैं।
मुख्य अतिथि डॉ. रवीन्द्र कुमार ने विभाजन के ऐतिहासिक संदर्भ और उसके विभिन्न आयामों पर विचार रखते हुए विशेष रूप से इस बात पर प्रकाश डाला कि विभाजन का फिल्म इंडस्ट्री पर क्या पड़ा। उन्होंने कहा कि विभाजन के बाद कई कलाकार पाकिस्तान गए, लेकिन उनमें से सिर्फ़ नूरजहां और ईशरत उर्फ बिब्बो ही सफल हुईं।
चर्चा में डॉ. जसपाल सिंह, श्री महेंद्र वेद और प्रो. रवि टेकचंदानी ने भी पुस्तक के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि विभाजन को केवल राजनीतिक घटना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। विस्थापन, पुनर्वास, सांस्कृतिक विघटन, पारिवारिक स्मृतियों और पीढ़ियों तक चले आ रहे अनुभवों के माध्यम से भी विभाजन को समझने की आवश्यकता है।
वक्ताओं ने रेखांकित किया कि 1947 की घटना को लगभग आठ दशक बीत जाने के बावजूद विभाजन की स्मृतियां भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में आज भी मौजूद हैं। इसलिए विभाजन से जुड़े ‘शेष सवालों’ को समझना केवल अतीत की पड़ताल नहीं, बल्कि वर्तमान को समझने का भी एक माध्यम है। वक्ताओं ने पुस्तक के कथ्य, ऐतिहासिक दस्तावेजों और विभाजन से जुड़े आज भी अनुत्तरित सवालों पर भी गहन चर्चा की।कार्यक्रम के स्वागत वक्तव्य में जनपद संपदा विभाग, आईजीएनसीए के विभागाध्यक्ष प्रो. के. अनिल कुमार ने ‘ज्ञानपथ’ पुस्तक चर्चा शृंखला के उद्देश्य और उसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस तरह के संवाद महत्त्वपूर्ण पुस्तकों के माध्यम से समाज और संस्कृति से जुड़े गंभीर विषयों पर व्यापक चर्चा का अवसर प्रदान करते हैं।
कार्यक्रम में विद्वानों, लेखकों, पत्रकारों, शोधार्थियों और संस्कृति-प्रेमियों की उपस्थिति रही। चर्चा ने 1947 के विभाजन को इतिहास की एक बीती घटना के बजाय उसकी निरंतर बनी हुई मानवीय और सामाजिक स्मृतियों के संदर्भ में देखने का अवसर प्रदान किया।
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