नई दिल्ली के मंडी हाउस स्थित एएसआई के धरोहर भवन में आयोजित इस कार्यक्रम केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावतगजेंद्र सिंह शेखावत मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह विशिष्ट अतिथि थे। राज्यसभा के पूर्व सांसद एवं भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने मुख्य वक्तव्य दिया। अध्यक्षता सांस्कृतिक चिंतक डॉ. अनिल गोयल ने की।
कार्यक्रम का स्वागत संबोधन भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के महानिदेशक श्री वाई. एस. रावत ने किया। उद्घाटन संबोधन दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय के कला, मीडिया एवं डिजाइन संकाय के डीन प्रो. (डॉ.) रमेश सी. गौड़ ने दिया। पुस्तक के लेखक एवं संपादक, प्रख्यात पत्रकार और राज्यसभा के पूर्व सांसद श्री तरुण विजय ने पुस्तक की विषयवस्तु और उसके उद्देश्य पर प्रकाश डाला। धन्यवाद ज्ञापन आईजीएनसीए के कला निधि प्रभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. के. अनिल कुमार ने किया।
इस अवसर पर केन्द्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि भारत की ज्ञान परम्पराओं, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक विरासत ने विश्व के अनेक देशों को आकर्षित किया है। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीयों के मन में अपनी सभ्यता, संस्कृति और परम्पराओं के प्रति गौरव के भाव को कमजोर करने के प्रयास हुए। इसके परिणामस्वरूप भारतीयों की अपनी ज्ञान परम्पराओं और सांस्कृतिक आदर्शों को देखने की दृष्टि भी प्रभावित हुई। भारतीय सभ्यता की विशेषता यह है कि वह अपने अतीत से प्रेरणा ग्रहण करते हुए भविष्य की ओर बढ़ती है। भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण जैसे आदर्श तथा ऋषियों, मनीषियों और ज्ञान साधकों की परम्परा हमारी सांस्कृतिक चेतना के महत्त्वपूर्ण आधार हैं।
श्री शेखावत ने कहा कि आज देश में बदलते परिदृश्य के साथ नई पीढ़ी अपनी सभ्यता, संस्कृति और विरासत को गर्व की दृष्टि से देख रही है। भारत की सांस्कृतिक पहचान के प्रति गौरव का यह भाव समाज में सकारात्मक परिवर्तन का संकेत है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अपनी सभ्यतागत विरासत को समझना, सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति आत्मगौरव विकसित करना और देश के विकास के साथ लोगों को जोड़ना वर्तमान समय की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने पुस्तक की सराहना करते हुए इसके संपादक सांस्कृतिक चिंतक, लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री तरुण विजय को साधुवाद दिया कि उन्होंने सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण और पुनरुत्थान के महत्त्व को प्रतिपादित करती पुस्तक पाठकों के सामने प्रस्तुत एक महती कार्य किया है।
डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने कहा कि भारत की सनातन संस्कृति और उसकी शाश्वत यात्रा को समझने के लिए अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति आत्मबोध और गौरव का भाव आवश्यक है। उन्होंने कहा कि स्वतन्त्रता के बाद लम्बे समय तक भारतीय संस्कृति के विषय में खुलकर अपनी बात रखने में एक अनावश्यक संकोच दिखाई दिया, जिसके कारण औपनिवेशिक मानसिकता से पूरी तरह मुक्त होना सम्भव नहीं हो पाया। ‘टाइम्लेस इंडिया ‘ जैसी पुस्तकें भारत की सांस्कृतिक निरन्तरता और भारतीयता के मूल भाव को समझने का अवसर प्रदान करती हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय संस्कृति की शाश्वत और अविराम यात्रा को उचित दृष्टिकोण से समझना तथा शिक्षा व्यवस्था को औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्त करना समय की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है।
स्मारकों के संरक्षण और सांस्कृतिक स्मृति पर केंद्रित पुस्तक
‘टाइमलेस इंडिया’ भारत की सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण और पुनरुत्थान के संदर्भ में स्मारकों की भूमिका तथा राष्ट्र की ऐतिहासिक स्मृति के विमर्श को सामने लाती है। पुस्तक का शीर्षक ‘टाइमलेस इंडिया’ भारत की उस सांस्कृतिक निरंतरता की ओर संकेत करता है, जो विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों, स्थापत्य परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के माध्यम से आज भी विद्यमान है।
पुस्तक में स्मारकों के संरक्षण और राष्ट्र की स्मृति के उपनिवेशवादी दृष्टिकोण से मुक्तिकरण यानी ‘डिकॉलोनाइजिंग नेशन’स मेमोरी’ के विचार को विशेष महत्त्व दिया गया है। यह विषय भारत की सांस्कृतिक विरासत को अपने ऐतिहासिक अनुभवों, परंपराओं और सांस्कृतिक दृष्टि के आधार पर समझने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
कार्यक्रम में पुस्तक के प्रकाशन को भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और उसके व्यापक विमर्श की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया। पुस्तक का लोकार्पण संस्कृति, इतिहास, पुरातत्त्व और सांस्कृतिक अध्ययन से जुड़े विषयों पर संवाद को आगे बढ़ाने का अवसर भी बना।
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