चीन-पाकिस्तान की चुनौती के बीच भारत का रक्षा दांव, 2.12 लाख करोड़ रुपये के प्रस्तावों को मंजूरी, 82 फीसदी खरीद भारतीय उद्योग से

चीन और पाकिस्तान से लगी सीमाओं पर सुरक्षा चुनौतियों के बीच भारत ने अपनी सैन्य ताकत आधुनिक बनाने और स्वदेशी रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने 26 अक्टूबर को सशस्त्र बलों के लिए करीब 2.12 लाख करोड़ रुपये के रक्षा खरीद प्रस्तावों को सैद्धांतिक मंजूरी दी। इन प्रस्तावों के तहत लगभग 82 प्रतिशत खरीद भारतीय उद्योग से करने की योजना है। ड्रोन, ड्रोन-रोधी प्रणालियों, तोपों, हेलीकॉप्टरों और वायु रक्षा उपकरणों पर जोर इस बात का संकेत है कि भारत आधुनिक युद्ध की बदलती जरूरतों के अनुरूप अपनी सैन्य क्षमताएं विकसित करना चाहता है।

Written By : ram nath rajesh | Updated on: October 27, 2026 12:09 am

रक्षा खरीद में घरेलू उद्योग की भूमिका बढ़ाने की नीति पिछले कुछ वर्षों से लगातार आगे बढ़ाई जा रही है। वित्त वर्ष 2022–23 में रक्षा पूंजीगत खरीद बजट का 68 प्रतिशत हिस्सा घरेलू उद्योग से खरीद के लिए निर्धारित किया गया था। वित्त वर्ष 2023–24 से यह निर्धारण बढ़ाकर 75 प्रतिशत किया गया। अब 26 अक्टूबर के नए प्रस्तावों में भारतीय उद्योग की हिस्सेदारी लगभग 82 प्रतिशत रखने की योजना है। हालांकि, ये अलग-अलग आधार पर निकाले गए आंकड़े हैं—75 प्रतिशत वार्षिक बजट का निर्धारित हिस्सा है, जबकि 82 प्रतिशत मौजूदा प्रस्तावों के लिए है। इसलिए इसे राष्ट्रीय लक्ष्य में औपचारिक वृद्धि के बजाय घरेलू खरीद पर बढ़ते जोर के रूप में देखना चाहिए।

थलसेना के लिए ड्रोन और तोप प्रणाली

नए प्रस्तावों में थलसेना के लिए स्वचालित ट्रैक आधारित तोप प्रणाली, उच्च गतिशीलता वाले वाहन, हल्के बहुउद्देशीय हेलीकॉप्टर, बहुत कम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली और ड्रोन-रोधी उपकरण शामिल हैं। लंबी दूरी के कामिकाजे ड्रोन, निगरानी वाले मानवरहित विमान और एकीकृत निगरानी एवं हमला प्रणालियों की खरीद को भी मंजूरी दी गई है।

चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैन्य सतर्कता बनाए रखने के लिए निगरानी, सैनिकों की आवाजाही और दुर्गम क्षेत्रों में रसद की व्यवस्था महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर, पाकिस्तान से लगी सीमा पर ड्रोन के जरिए हथियारों की तस्करी और अन्य सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में ड्रोन-रोधी प्रणालियां उपयोगी हो सकती हैं। मई 2025 के भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव ने भी आधुनिक संघर्ष में हवाई सुरक्षा और मानवरहित प्रणालियों के महत्व को रेखांकित किया था।

नौसेना और वायुसेना की जरूरतें भी शामिल

नौसेना के लिए एक्टिव ऑफबोर्ड डिकॉय सिस्टम की खरीद को मंजूरी दी गई है। यह तकनीक जहाजों की ओर आने वाली मिसाइलों का ध्यान वास्तविक लक्ष्य से हटाकर उनकी सुरक्षा में मदद करती है। इसके अलावा, स्वदेशी डिजाइन और निर्माण वाले प्रमुख नौसैनिक प्लेटफॉर्मों की खरीद के प्रस्ताव भी शामिल हैं।

वायुसेना के लिए हेलीकॉप्टर, हथियार, वायु रक्षा प्रणालियां और मोबाइल एक्स-बैंड डॉप्लर मौसम रडार प्रस्तावित हैं। इन प्रणालियों से हवाई सुरक्षा, परिचालन तैयारी और अग्रिम क्षेत्रों में मौसम की निगरानी को मजबूती मिल सकती है।

स्वदेशी खरीद से क्या बदलेगा?

घरेलू रक्षा खरीद को बढ़ावा देने का उद्देश्य विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता घटाना, भारतीय कंपनियों की तकनीकी क्षमता बढ़ाना और देश में रक्षा उपकरणों के उत्पादन को प्रोत्साहित करना है। वित्त वर्ष 2024–25 में घरेलू उद्योग को दिए गए रक्षा मंत्रालय के अनुबंधों का मूल्य ₹1,68,922 करोड़ था, जो कुल अनुबंध मूल्य का लगभग 81 प्रतिशत था। इससे रक्षा खरीद में भारतीय उद्योग की महत्वपूर्ण भूमिका स्पष्ट होती है।

हालांकि, घरेलू कंपनी से खरीद और पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से बने उपकरण में अंतर है। वास्तविक आत्मनिर्भरता के लिए डिजाइन, महत्वपूर्ण कलपुर्जों, तकनीक और रखरखाव की क्षमता भी देश में विकसित करनी होगी।

यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि 2.12 लाख करोड़ रुपये की मंजूरी खरीद प्रक्रिया का शुरुआती चरण है। सभी प्रस्तावों के ठेके जारी होने और उपकरणों की आपूर्ति होने में समय लग सकता है। भारत की रक्षा आधुनिकीकरण योजना की सफलता अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि आधुनिक प्रणालियां कितनी जल्दी सेना को मिलती हैं और वे सीमा तथा समुद्री सुरक्षा की वास्तविक जरूरतों को कितना पूरा करती हैं।

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