दोनों मुख्य वक्ताओं ने अपने व्याख्यान में नृत्य में सौंदर्यबोध की भूमिका और उसके व्यापक जीवन-दर्शन से सम्बंध पर केंद्रित रहा। भारतीय शास्त्रीय नृत्य केवल शारीरिक मुद्राओं और लय-ताल की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भाव, रस, संवेदना और आध्यात्मिक अनुभूति का समन्वित रूप है। कथक जैसी शास्त्रीय नृत्य परम्परा में अंग-संचालन, भावाभिव्यक्ति, संगीत और लय के माध्यम से मानवीय अनुभवों तथा जीवन के विविध पक्षों को अभिव्यक्त किया जाता है। नलिनि और कमलिनि अस्थाना ने कहा, “हमारे नृत्य की शुरुआत एक बहुत ही बुनियादी सिद्धांत से होती है — ‘यतो हस्तस्ततो दृष्टिः, यतो दृष्टिस्ततो मनः। यतो मनस्ततो भावः, यतो भावस्ततो रसः।’ अर्थात् जहां हाथ जाते हैं, वहां दृष्टि जाती है; जहां दृष्टि जाती है, वहां मन जाता है; जहां मन जाता है, वहां भाव उत्पन्न होता है और जहां भाव होता है, वहां रस की निष्पत्ति होती है। हमारा मन जहां जाता है, हमारी भावनाएं भी वहीं केंद्रित हो जाती हैं। वहीं से रस का जन्म होता है। नृत्य में भावहीनता या रस का अभाव संभव नहीं है।
यदि नृत्य में रस नहीं है, तो वह नृत्य अपने मूल उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकता। नृत्य तो रस से परिपूर्ण होता है। प्रश्न यह है कि हम जीवन में इस रस को किस प्रकार प्राप्त करते हैं? जब हमारा मन किसी कार्य में पूरी तरह लगा होता है, तो उस कार्य को करने का भाव भी हमारे भीतर उत्पन्न होता है। जिस कार्य के बारे में हम सोचते हैं, उससे सम्बंधित भाव विकसित होता है और उसी से रस की उत्पत्ति होती है। तब हम जो भी करते हैं, उसका आनंद लेते हैं। चाहे वह नृत्य हो, भोजन बनाना हो, चित्रकारी हो या कोई अन्य काम, यदि हम उसे ईश्वर की आराधना समझकर, किसी व्यक्ति के प्रति सम्मान के भाव से अथवा अपने गुरु के सामने पूरी निष्ठा से करते हैं, तो हमें उसमें आनंद मिलता है।”
पद्मश्री नलिनी अस्थाना और पद्मश्री कमलिनी अस्थाना भारतीय शास्त्रीय नृत्य, विशेषकर कथक की प्रतिष्ठित साधिकाएं हैं। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित इन दोनों कलाकारों ने अपनी साधना और प्रस्तुतियों के माध्यम से भारतीय नृत्य परम्परा को समृद्ध किया है। व्याख्यान में उन्होंने नृत्य मुद्राओं और अपने अनुभवों के माध्यम से शास्त्रीय नृत्य की सौंदर्यपरक दृष्टि, उसकी सांस्कृतिक महत्ता और समकालीन जीवन में उसकी प्रासंगिकता को समझाने का प्रयास किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने भारतीय कला परम्पराओं के अध्ययन और उनके माध्यम से भारतीय ज्ञान एवं सौंदर्यबोध की समझ विकसित करने के महत्त्व को रेखांकित किया। वहीं, प्रो. (डॉ.) ऋचा काम्बोज ने व्याख्यान शृंखला की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए भारतीय कला, सौंदर्यशास्त्र और सांस्कृतिक विरासत के विविध आयामों पर संवाद की आवश्यकता को रेखांकित किया।
आईजीएनसीए भारतीय कला और संस्कृति की विविध परम्पराओं के संरक्षण, संवर्धन, अध्ययन तथा प्रसार के लिए निरंतर कार्यरत है। कलादर्शन विभाग की इस व्याख्यान शृंखला का उद्देश्य भारतीय कला-दृष्टि, सौंदर्यशास्त्र और सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न पक्षों पर विमर्श को प्रोत्साहित करना है। इस आयोजन ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य की सौंदर्यपरक परम्परा और जीवन में उसकी भूमिका पर विचार करने का अवसर प्रदान किया।
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