Ashtavakra ने राजा जनक को बताया था ज्ञान, वैराग्य और मुक्ति के उपाय

त्रेता युग में उद्दालक ऋषि के शिष्य का नाम कहोड़ था, कहोड़ को सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान देने के पश्चात उद्दालक ऋषि ने अपनी रूपवती व गुणवती कन्या सुजाता का विवाह उनके साथ कर दिया।

Written By : मृदुला दुबे | Updated on: November 5, 2024 7:08 am

कुछ दिनों के बाद जब वह गर्भवती हुई, तो एक दिन कहोड़ वेदपाठ कर रहे थे। तभी गर्भ के भीतर से बालक ने कहा कि पिताजी आप वेद का पाठ गलत कर रहे हैं। इसलिए क्रोधित होकर कहोड़ ने बालक को श्राप देते हुए कहा कि तू गर्भ से ही मेरा अपमान कर रहा है इसलिए तू आठ स्थानों से वक्र (टेढ़ा) हो जाएगा। महर्षि अष्टावक्र(Ashtavakra) आठ अंगों से टेढ़े पैदा हुए।

अष्टावक्र(Ashtavakra) बड़े होकर वेदों के महान विद्वान बने ।बचपन से ही वे अपने पिता के बारे में पूछते तब लोग उन्हें बताते कि काहोड शास्त्रार्थ में स्वयं को वेदों का विद्वान सिद्ध करने के लिए जनक के दरबार में गए थे। अष्टावक्र(Ashtavakra) अपने पिता की खोज में भी मिथिला में जनक के दरबार में पहुंच गए। उस समय राजा जनक अपने विद्वानों और मंत्रियों के साथ विचार -विमर्श कर रहे थे। द्वार पर ऋषि अष्टवक्र को कुरूप और आठ अंगों से टेढ़ा देखकर सभी विद्वानों ने हंसना प्रारंभ कर दिया। उन्हें हंसता हुआ देखकर अष्टावक्र भी बहुत तेज हंसने लगे।

तब अष्टावक्र ने कहा – ” ये चमारों की सभा है। यहां सत्य की चर्चा हो रही है?। तुम सब घड़े को देखकर हंसे या कुम्हार को? अर्थात मुझे देखकर हंसे या मुझे बनाने वाले को।” ऐसा सुनकर सभी लज्जित हो गए, तब उस 12 वर्ष के बच्चे से प्रभावित होकर राजा जनक ने उस ऋषि को “प्रभु” कहकर संबोधित किया और पूछा कि आप क्यों हंसे? अष्टावक्र(Ashtavakra) बोले कि हे राजन ! 24 पक्षों वाला,छ: ऋतुओं वाला, बारह महीनों वाला तथा तीन सौ साठ दिनों वाला संवत्सर आपकी रक्षा करें। “यह अज्ञानियों की सभा है। इन्होंने सिर्फ मेरे चमड़ी से ढके टेढ़े शरीर को देखा लेकिन शरीर के भीतर की चेतना को जानने का भी प्रयास नहीं किया। मैं इनकी अज्ञानता पर हंस रहा हूं।”

तब राजा जनक बहुत प्रभावित हुए और उनसे तीन प्रश्न पूछे?

1. कैसे मिलेगा ज्ञान ?
2. कैसे मिलेगी मुक्ति?
3. कैसे मिलेगा वैराग्य?

श्लोक:
कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति।
वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद् ब्रूहि मम प्रभो॥

अनुवाद:
राजा जनक ने ज्ञान-प्राप्ति एवं मुक्ति-हेतु अष्टावक्र (Ashtavakra) के सामने जिज्ञासा की कि हे प्रभो! ज्ञान कैसे प्राप्त होता है? मुक्ति कैसे होती है? और वैराग्य कैसे प्राप्त होता है? यह मुझे कहिए।

राजा जनक को ज्ञान का उत्तम अधिकारी जानकर अष्टावक्र जी बोले।

श्लोक: 1
मुक्तिमिच्छसि चेतात विषयान् विषवत्त्यज।
क्षमार्जवदयातोषं सत्यं पीयूषवद् भज॥

अनुवाद:
अष्टावक्र (Ashtavakra)ने कहा – हे प्रिय! यदि तू मुक्ति चाहता है तो विषयों के विष के समान छोड़ दे और क्षमा, अर्जव (सरलता), दया, संतोष और सत्य को अमृत के समान सेवन कर।

श्लोक:2
न पृथ्वी न जलं नाग्निर्न वायुर्ध्यौर्न वा भवान्।
एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्धि मुक्तये॥

अनुवाद:
तू न पृथ्वी है, न जल है, न अग्नि है, न वायु है, न आकाश है। मुक्ति के लिए अपने को इन सबका साक्षी चैतन्यरूप जान ।

ज्ञान सुनकर सत्य जानने के बाद राजा जनक बहुत प्रसन्न होकर उदार बचन बोले –

अन्वय:- अहो अहम् निरंजनः शांतः प्रकृतेः परः बोधः (अस्मि) अहम् एतावंतम् कालम् मोहेन विडंबित एव || ११ ||

भावार्थ:

राजा जनक ने अष्टावक्र(Ashtavakra) को अपना गुरू बना लिया और श्रीगुरु के वचनों का अमृत पान कर आत्मा का वास्तविक स्वरूप को समझ में लिया। इस कारण जनक बने शिष्य, अपने गुरु से आत्म अनुभूति करते हुए कहते है कि – “हे गुरु, यह अद्भुत है कि मैं तो निरंजन हूँ, अर्थात पाप रहित हूँ; मैं शांत हूँ, अर्थात सभी विकारों से रहित हूँ; प्रकृति से परे अर्थात माया के अंधकार से भी रहित हूँ। अहो! आज तक गुरु की कृपा के बिना, मैं मोह के कारण अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान नहीं पाया था और इस अज्ञानता से दुखी था। परन्तु अब गुरु की कृपा से मुझे परम आनंद की प्राप्ति हुई है।”

अष्टावक्र (Ashtavakra)ने अपने बंदी पिता को मुक्त कराने के लिए बंदन को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी और उन्हें हराकर अपने पिता को मुक्त करवाया। इस प्रकार उनके अपने पुत्र ने अपनी बुद्धि बल के प्रयोग से गुलामी से बचाया। कठोड समझ गए कि उनकी अज्ञानता के कारण ही उनके बेटे को दुख का सामना करना पड़ा। अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए उन्होंने अष्टावक्र को सामानंग नदी में छलांग लगाने को कहा ।नदी से निकलते ही अष्टावक्र के अंग सीधे हो गए।

वंदिन और अष्टावक्र का बहुत ज्ञानवर्धक शास्त्रार्थ अगले भाग में……..

 

(मृदुला दुबे योग शिक्षक और आध्यात्मिक गुरु हैं.)

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