आज से कई दशक पहले अंग्रेजी स्नातक कक्षा में मृत्यु को संबोधित प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि ‘जॉन डन’ कविता हमने पढ़ी थी .मृत्यु को देखने का उनका तरीका अपने ढंग का था . प्रायः मृत्यु को केंद्र में रखकर कोई सम्पूर्ण कविता संग्रह उपलब्ध नहीं है और इस मायने में ये संग्रह ‘मृत्यु कविताएं’ आम से हटकर है ! इन कविताओं के माध्यम से कवि अरुण देव जी ने उन सारे दृश्यों को सामने रखा है जो मृत्यु के आस पास होती है. भारतीय संस्कृति में मृत्यु की अवधारणा विश्व की अन्य संस्कृतियों से अलग है.
मृत्यु से उत्पन्न परिस्थितियों का बहुत चित्रात्मक वर्णन है इन कविताओं में जो पाठक शब्दों से ऊपर जाकर महसूस करने लगता है. संग्रह के प्रारंभ में ही हिंदी के वरिष्ठ, प्रतिष्ठित कवि अरुण कमल लिखते हैं : ” जीवन और मृत्यु सहोदर स्थितियां हैं। लेकिन खड़ी बोली हिंदी में ऐसी कोई कविता पुस्तक नहीं जो केवल मृत्यु सम्बन्धी अनुभव और स्थितियों से निर्मित हो।इस अर्थ में अरुण देव के इस संग्रह का प्रकाशन एक विरल घटना है।सौ पदों में प्रशस्त यह पुस्तक मृत्यु के प्रायः सभी आयामों ,पक्षों और मृत्युजनित भावों को पुंजीभूत करती है।”
संग्रह के प्राक्कथन में प्रसिद्ध विद्वान डॉ.राधाबल्लभ त्रिपाठी लिखते हैं : “मृत्यु पर अरुण देव की कविताएं पढ़ते हुए लगता है कि जीवन और मृत्यु के बीच कितना कम फासला है।एक बारीक रेखा है। इस पार जीवन है, उस पार मृत्यु। जीवन जैसे गिरने -गिरने को एक पत्ते का अटके रहना है।अटके रहने और टपकने के बीच का अंतराल जीवन है।” डॉ त्रिपाठी विस्तार में महाभारत के अनुशासन पर्व की उस कथा की भी चर्चा करते हैं जब मृत्यु को प्रथम बार इस लोक में भेजा गया ।क्यों ,कब और किन कारणों से मृत्यु की अवधारणा आयी इसकी भी चर्चा डॉ. त्रिपाठी करते हैं।डॉ. त्रिपाठी यह भी कहते हैं आगे कि ” कविता मृत्यु का सामना करने के लिए हमें कवच पहना डेती है। वेद तथा वेदों के भाष्यकार सायण छंद का यही अर्थ बताते हैं……..।”
डॉ. राधाबल्लभ त्रिपाठी की ये पंक्तियां ध्यान देने योग्य हैं : “कविता अमरता का गान न भी हो सके तो मृत्यु की चुनौती से जूझने का सम्बल तो हो ही सकती है जो कि अरुण देव के इस संकलन की कविताएं हैं।” संग्रह के कवि अरुण देव प्रारम्भ में ‘मृत्यु का अभिवादन में लिखते हैं : ” मृत्यु ही है जो अजर,अमर, अपरिहार्य और सर्वव्यापी है। राख से अस्थियां चुनने को फूल चुनना कहते हैं। ये कविताएँ फूल की तरह अपनी पंखुड़ियों में पूर्ण हों ऐसा सोचता रहा। एक तरह से यह संग्रह मृत्यु का अभिवादन है।”
संग्रह के प्रथम पद को देखिये : ” अन्त है अन्ततः है अन्तिम है आश्वस्ति है।”
दूसरे पद की कुछ पंक्तियों को देखिये “….. दुर्गम दीर्घ और जोखिम भरी यात्राओं में कहां चले जाते हैं लोग ? इस यात्रा को कौन जानता है ?”
नवम पद पर ध्यान दें “अग्नि खा जाएगी पी जाएगी नदी हवा ले जाएगी अपने साथ मिट्टी मिला देगा मिट्टी में उसे।”
संग्रह में पंचानवें पद को देखिए: “सभी गर्वोक्तियाँ गिर गई हैं और करुणा मृत्यु के पास बची है।”
संग्रह के सौवें और अन्तिम पद पर विशेष ध्यान देने योग्य है: “मैं नहीं रहूंगा तुम नहीं रहोगे सृष्टि रहे।” संग्रह के अन्त में उत्तर -कथन में चर्चित कवयित्री गगन गिल कहती हैं : ” …..हम कितनी बार ,किस किस तरह से रोज़ मरते हैं उसकी बानगी भी । इस मरने में भी सांस्कृतिक स्मृति है, जैसे हमारे जीने में, इसे रेखांकित करतीं ये कविताएं अनन्य हैं ।’ सौ पृष्ठों की इस कविता संग्रह की छपाई सुंदर है और मुखपृष्ठ प्रतीकात्मक है. संग्रह पठनीय एवं अति संग्रहणीय है.
पुस्तक:मृत्यु कविताएं ,पृष्ठ:100,
कवि: अरुण देव , प्रकाशक :राजकमल
पेपरबैक , मूल्य:रु .250.
प्रथम संस्करण :2025

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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एक अनूठी पुस्तक की संक्षिप्त पर सार्थक समीक्षा
बहुत अच्छी समीक्षा
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