आज की पुस्तक चर्चा में मधुमिता साहा का हाल में प्रकाशित कविता संग्रह “अहसासों के मोती”. भारत के आजादी के बाद हरेक क्षेत्र में प्रगति हुई है, विकास हुआ है पर जिस एक क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है, सकारात्मक परिवर्तन हुआ है वह है- स्त्री साक्षरता !
आजादी के पहले भी देश के किसी किसी कोने में संघर्षशील ,साहसी महिलाओं ने स्त्री शिक्षा की पहल की थी. बंगाल,महाराष्ट्र केरल जैसे राज्यों में अनेक साहसी और संघर्षशील विदुषियों हुईं जिन्होंने स्त्री शिक्षा के प्रचार, प्रसार और संवेदना स्थापित कर उसे सामाजिक आंदोलन और मौलिक आवश्यकता का रूप दिया. भारतीय परंपरा में अनेक विदुषी स्त्रियों के होने का प्रमाण मिलता है पर उसमें भी एक विडंबना थी. यह शिक्षा अति संभ्रांत और तथाकथित उच्च वर्ग की महिलाओं तक ही सीमित थी और इस बात में भी बहुत हद तक संदेह किया जा सकता है कि बहुत सारी उत्कृष्ट लेखनी, शोध और श्लोक महिलाओं के द्वारा रचे गए थे पर वह उनके पति या परिवार के किसी अन्य पुरुष के नाम अंकित हैं!
यह मात्र हमारे देश में ही नहीं पूरी दुनिया की समस्या रही है. विश्व के बहुत सारे वैज्ञानिक आविष्कारों में स्त्री का नाम नहीं उसके पति का नाम अंकित है! भारत में स्वतंत्रता के बाद धीरे- धीरे स्त्री शिक्षा में प्रगति और विकास होता गया और स्त्रियां अपना निर्णय स्वयं लेने लगी. जहां आजादी के पूर्व हिंदी अंगुली पर गिने जाने योग्य ही लेखिका और कवयित्री थीं आज इसकी संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है. इक्कीसवीं सदी ने हिंदी लेखन में महिलाओं का बहुत जोरदार प्रवेश हुआ है.
ध्यातव्य है कि अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को उठाते हुए ये महिलाएं रचनात्मक हैं. उन्होंने कविता, कहानी और लेखों के माध्यम से अपनी बात कहनी शुरू की है. उसमें उनकी बात होती है, उनका नजरिया होता है, उनका दृष्टिकोण होता है . किसी बात को देखने, समझने और महसूस करने के स्त्री और पुरुष के नजरिए और दृष्टिकोण में बहुत अंतर होता है. “अहसासों के मोती ” कवयित्री मधुमिता साहा का पहला कविता संग्रह है जरूर है पर मधुमिता लंबे समय से कविताएं लिखती रही हैं.अनेक पत्र ,पत्रिकाओं में इनकी कविताएं प्रकाशित होती रही हैं ,साझा संकलनों में भी इनकी कविताएं शामिल हैं. कविताओं में कवयित्री मधुमिता के भाव मर्मस्पर्शी हैं पर बहुत स्थान पर महसूस होता है कि उन बातों को और भी काव्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है. पर यहाँ भी एक विडंबना है अधिकांश ऐसी कवयित्रियों कथाकारों को पुराने लिखे अच्छे साहित्य पढ़ने का अवसर नहीं मिला, सुविधा नहीं मिली. ऐसा प्रायः देखा गया है कि गृहिणी महिलाएं लेखन के साथ विस्तार से गहन अध्ययन भी करने लगती हैं. कुछ दिनों के अध्ययन से ही उनकी भाषा को पंख लग जाते है, शब्द भंडार आकर्षक हो जाते हैं।
103 पृष्ठ के पुस्तक में कुल 85 कविताएं हैं. ये सारी कविताएं ज़िंदगी के इर्द- गिर्द ही घूमती रहती हैं पर कुछ कविताएं तो बहुत गंभीर कविताएं हैं. कविताएं बहुत भावुक कर देने वाली हैं. सरल भाषा में लिखी गईं कविताएं दिल को छूती हैं. संग्रह पठनीय है.
संग्रह : अहसासों के मोती , कवयित्री : मधुमिता साहा , पृष्ठ: 103, प्रकाशन : श्री नर्मदा प्रकाशन , मूल्य : रु 280.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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