Election Result 2024 : मायावती नहीं, चंद्रशेखर आजाद रावण पसंद

हाल में लोकसभा, चुनाव ने भाजपा को तो अपने प्रदर्शन पर सोचने को मजबूर किया ही, बसपा को तो अप्रासंगिक ही बना दिया। बसपा मात्र ऐसी पार्टी है जिसका एक भी प्रत्‍याशी नहीं जीता। उसे अपने परंपरागत दलित वोट तो कमोबेश मिले लेकिन मुस्लिम वोट नहीं मिले। बसपा सुप्रीमो मायावती (Mayawati) तो दलित वोटों पर संतोष व्‍यक्त कर रही हैं लेकिन उनके समाज के पूरे वोट उन्‍हें मिले हैं,इसमें संदेह है।

चंद्रशेखर आजाद रावण और बसपा प्रमुख मायावती
Written By : रामधनी द्विवेदी | Updated on: June 6, 2024 8:11 pm

चंद्रशेखर के रूप में नया नेता

2009 के चुनावों के बाद से बसपा के वोटों में लगातार गिरावट आ रही है। वह नगीना की सीट भी नहीं जीत सकीं। ऐसा माना जा रहा है कि दलित मतदाता भी उनसे दूर जा रहा है। उसे चंद्रशेखर ( Chandra Shekhar) के रूप मे नया नेता मिलता दिख रहा है। इस पराभव के क्‍या कारण हैं। इनसे कैसे उबरा जाएगा, इस पर मंथन करना बसपा के लिए नितांत जरूरी है। नहीं तो बसपा को देश की राजनीति में हाशिये पर जाते देर नहीं लगेगी।

मत प्रतिशत में लगातार गिरावट

2004 में बसपा को 24.67 फीसद वोट मिले थे और 19 सांसद जीते थे, 2009 में बसपा के 20 सांसद जीते थे और उसे लगभग 27.42 फीसद वोट मिले थे। यह उसका सबसे अच्‍छा प्रदर्शन था। लेकिन उसके बाद से लगातार उसके मत प्रतिशत और जीते सांसदों की संख्‍या में गिरावट आई है।2014 में 19.77 फीसद वोट मिले पर कोई सांसद नहीं बना, 2019 में 10 सांसद जीते। हाल में सम्‍पन्‍न चुनावों में उसके दस प्रतिशत वोट हाथ से निकल गए। केवल 9.3 फीसद वोट मिले। साथ छोड़ने वालों में मुस्लिम मतदाता प्रमुख हैं। ये सभी सपा-कांग्रेस गठबंधन की ओर चले गए क्‍यों कि उसी में उन्‍हें अपना भविष्‍य दिखाई दे रहा था। मायावती को यह कहने पर मजबूर होना पड़ा कि अब वह मुसलमानों को सोच समझ कर टिकट देंगी।

क्‍यों दूर हुए मतदाता

आखिर बसपा के मतदाता उससे उदासीन क्‍यों हुए। बसपा अपने आक्रामक विचार और प्रचार के लिए जानी जाती रही है। इन दिनों उसके इस तेवर मे कमी आ गई है। मायावती ( Mayawati) ने भतीजे आकाश आनंद ( Akash Anand) को जब अपना उत्‍तराधिकारी घोषित किया तो लोगों को लगा कि यह युवक कुछ नया करेगा। लेकिन इस चुनाव में उनके उग्र रूप में मायावती ने उनकी अनुभवहीनता देखी और बीच में ही उन्‍हें चुनाव प्रचार और पार्टी के पद से भी हटा दिया। इसका गलत संदेश उनके समर्थकों खासकर दलित वर्ग में गया। लोग आकाश आनंद के तेवर को पसंद कर रहे थे। उनके हमले विरोधियों को चुभ रहे थे। उनको बीच चुनाव में हटा लेने से पार्टी के समर्थक निराश हुए और पार्टी के परंपरागत वोट भी पार्टी से हट गए। सपा और कांग्रेस ने आरक्षण का मुद्दा उठाकर ऐसे लोगों को अपनी ओर मोड़ा और इसका उन्‍हें लाभ भी हुआ।

सपा- कांग्रेस की ओर गये मुस्लिम

इस बार के चुनाव में मुसलमानों ने बसपा की तुलना में सपा और कांग्रेस में अपने हितों का रक्षक देखा। भाजपा के मुस्लिम आरक्षण के विरोध ने भी उन्‍हें एकजुट किया। इसका लाभ इन दोनों पार्टियों को मिला। जिन दस सीटों पर उसके निवर्तमान सांसद थे, वहां भी उन्‍हें मुस्लिम वोट नहीं मिले। इस बार बसपा ने 21 मुस्लिम प्रत्‍याशियों को टिकट दिया था और इनमें से कोई नहीं जीत पाया। जबकि सपा के सभी मुस्लिम प्रत्‍याशी जीते। सपा के सात सांसद अनुसूचित जाति के भी हैं।

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