विपक्ष के निशाने पर सीधे ज्ञानेश कुमार हैं, लेकिन राजनीतिक निशाना इससे कहीं बड़ा है—केंद्र की एनडीए सरकार और आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता का सवाल। विपक्ष SIR को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहा है और आरोप लगा रहा है कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण के नाम पर बड़े पैमाने पर मतदाताओं को चुनावी प्रक्रिया से बाहर किया गया। चुनाव आयोग इन आरोपों से सहमत नहीं है और उसका कहना है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना तथा पात्र मतदाताओं को सुनिश्चित करना है।
13 करोड़ नाम बाहर, आयोग ने शुरू किया सुधार अभियान
विवाद का सबसे बड़ा आंकड़ा अब सामने है। चुनाव आयोग के SIR अभियान के दौरान 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम बाहर हुए हैं। यह आंकड़ा उन नामों का है जो ड्राफ्ट रोल से हटे; इनमें मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट अथवा अन्य कारणों से अपात्र मतदाता भी शामिल हो सकते हैं। इसलिए इसे सीधे 13 करोड़ पात्र मतदाताओं के नाम काटे जाने के रूप में देखना सही नहीं होगा। लेकिन राजनीतिक विवाद यहीं से और तेज हो गया है।
आज ही चुनाव आयोग ने SIR पूरी कर चुके 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विशेष अभियान चलाकर उन पात्र मतदाताओं को दोबारा जोड़ने का निर्देश दिया, जिनके नाम छूट गए हैं। नए और पहली बार वोट डालने वाले मतदाताओं को भी इस अभियान में शामिल किया जाएगा। यानी जिस प्रक्रिया को लेकर विपक्ष महीनों से सवाल उठा रहा था, अब उसी प्रक्रिया से बाहर रह गए मतदाताओं की पहचान और पुनः नामांकन के लिए आयोग को विशेष अभियान चलाना पड़ रहा है। विपक्ष के लिए यह राजनीतिक हमला करने का नया आधार बन गया है।
ज्ञानेश कुमार बने विपक्ष के निशाने का केंद्र
विपक्ष का तर्क है कि मामला केवल मतदाता सूची में नाम जोड़ने-काटने का नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और निर्णय प्रक्रिया का है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक जांच में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के भीतर SIR, मतदाता नाम जोड़ने-काटने और चुनावी डेटा से संबंधित फैसलों पर आपत्तियां दर्ज कीं। आयोग ने इन रिपोर्टों पर अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि संबंधित पत्र नीतिगत या IT संबंधी मामलों के बारे में नहीं थे और आयोग के भीतर अलग-अलग मत होना असामान्य नहीं है। यही रिपोर्ट अब विपक्ष के राजनीतिक अभियान का प्रमुख हथियार बन चुकी है।
कांग्रेस और उसके सहयोगी दल सवाल उठा रहे हैं कि यदि चुनाव आयोग तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था है तो क्या उसके महत्वपूर्ण फैसले सामूहिक रूप से लिए गए या नहीं। CJP और अन्य प्रदर्शनकारी समूहों ने भी इन्हीं आरोपों के आधार पर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को आंदोलन का केंद्र बनाया है।
अगले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट में होगी असली कानूनी परीक्षा
राजनीतिक सड़क संघर्ष के साथ अब यह विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। शीर्ष अदालत ने अगले सप्ताह उस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी है जिसमें CEC ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग के कुछ महत्वपूर्ण फैसले अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए। याचिका में SIR को भी चुनौती दी गई है और आयोग की संवैधानिक निर्णय प्रक्रिया की न्यायिक जांच की मांग की गई है। इस सुनवाई का महत्व इसलिए बढ़ गया है क्योंकि अदालत में एक तरफ CEC की व्यक्तिगत भूमिका और दूसरी तरफ पूरे चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का सवाल उठेगा। विपक्ष के लिए यह राजनीतिक मोर्चे के साथ-साथ कानूनी मोर्चा भी है।
यूपी से पंजाब और उत्तराखंड तक चुनावी गणित
ज्ञानेश कुमार को लेकर शुरू हुआ यह संघर्ष ऐसे समय तेज हुआ है जब देश अगले बड़े विधानसभा चुनावों की ओर बढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों के प्रमुख राज्यों में हैं। उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है। उत्तराखंड में भी भाजपा सत्ता में है, जबकि पंजाब में आम आदमी पार्टी सरकार चला रही है। इसलिए तीनों राज्यों में चुनाव आयोग और SIR का मुद्दा अलग-अलग राजनीतिक संदर्भों में इस्तेमाल हो सकता है।
उत्तर प्रदेश में विपक्ष के लिए मतदाता सूची का सवाल खास तौर पर बड़ा मुद्दा बन सकता है। देश के सबसे बड़े विधानसभा राज्य में चुनावी मुकाबले से पहले यदि विपक्ष SIR को ‘वोट बचाने’ के अभियान के रूप में स्थापित करता है तो यह केवल चुनाव आयोग के खिलाफ हमला नहीं रहेगा, बल्कि सीधे भाजपा और केंद्र की एनडीए सरकार के खिलाफ राजनीतिक अभियान का हिस्सा बन जाएगा। पंजाब में तस्वीर अलग है। यहां आम आदमी पार्टी खुद सत्ता में है, लेकिन वह ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय है। INDIA ब्लॉक की बैठक से AAP की दूरी के बावजूद इस मुद्दे पर उसका कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों के साथ सड़क पर आना बताता है कि चुनावी प्रक्रिया का सवाल दलगत सीमाओं को भी कुछ हद तक पार कर रहा है।
उत्तराखंड में भी SIR और मतदाता सूची आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले विपक्ष के लिए सरकार पर हमला करने का एक और मुद्दा बन सकता है।
गांधी जयंती से शुरू हुआ आंदोलन अब लंबा चलेगा
30 सितंबर को INDIA ब्लॉक की बैठक में तय रणनीति के मुताबिक 2 से 8 अक्टूबर तक देशभर में प्रदर्शन और ‘सेव डेमोक्रेसी’ अभियान चलाया जाना है। इसके बाद 6 अक्टूबर को विपक्षी सांसदों के चुनाव आयोग तक मार्च और 1 नवंबर को दिल्ली में बड़ी रैली की योजना है। इससे साफ है कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगने का अभियान एक दिन का कार्यक्रम नहीं है। विपक्ष इसे लंबी राजनीतिक लड़ाई में बदलना चाहता है। दिल्ली में आज प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर तक पहुंचने से रोकने के लिए भारी सुरक्षा व्यवस्था की गई। दिल्ली पुलिस ने कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी थी और हजारों सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए। प्रदर्शनकारियों की हिरासत ने भी विवाद को और राजनीतिक रंग दिया।
मुंबई में CJP के प्रदर्शन ने आंदोलन को एक नया सामाजिक और युवा चेहरा दिया। CJP ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के साथ देश के दूसरे शहरों में भी आंदोलन जारी रखने की घोषणा की है।
अब लड़ाई ज्ञानेश कुमार से आगे
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यही है कि विपक्ष की लड़ाई अब केवल CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक सीमित नहीं रह गई है। SIR में हटे 13 करोड़ से ज्यादा नाम, चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल, छूटे मतदाताओं को फिर से जोड़ने का आयोग का विशेष अभियान और अगले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई—इन सभी ने विपक्ष को केंद्र की एनडीए सरकार पर हमला करने के लिए एक साझा राजनीतिक मंच दे दिया है। 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले विपक्ष अब इस मुद्दे को ‘किसकी सरकार बनेगी’ से आगे बढ़ाकर ‘कौन वोट दे पाएगा और किसके वोट का हिसाब होगा’ के सवाल से जोड़ने की कोशिश कर रहा है।
दूसरी ओर चुनाव आयोग के सामने चुनौती भी उतनी ही बड़ी है। उसे यह स्पष्ट करना होगा कि ड्राफ्ट रोल से हटे करोड़ों नामों में कितने मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट मतदाता थे, कितने पात्र मतदाता छूटे और उनमें से कितनों को वापस जोड़ा गया। क्योंकि आने वाले चुनावों में मुकाबला केवल राजनीतिक दलों के बीच नहीं होगा। मतदाता सूची की विश्वसनीयता भी खुद एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुकी है और गांधी जयंती पर सड़क पर उतरा विपक्ष बता रहा है कि वह इस मुद्दे को 2027 के चुनाव तक छोड़ने के मूड में नहीं है।
ये भी पढ़ें :-SIR पर विपक्ष का बड़ा संग्राम, 6 अक्टूबर को चुनाव आयोग तक मार्च