इस अवसर पर अपना विचार प्रकट करते हुए, पूर्व राज्यपाल ने कहा कि हिन्दी को बहुत पहले ही राष्ट्र-भाषा हो जानी चाहिए थी। स्वतंत्रता के तत्काल बाद ही यह निर्णय हो जाना चाहिए था। किंतु राजनैतिक कारणों से यह नहीं हो सका, जो दुर्भाग्य-पूर्ण है। किंतु यह संतोष की बात है कि वर्तमान सरकार और हिन्दी के साहित्यकारों और हिन्दी-प्रेमियों के प्रयास से हिन्दी सांपूर्ण भारत वर्ष में संपर्क भाषा के रूप में विकसित हो रही है।
पूर्व राज्यपाल ने हिन्दी सेवियों को किया पुरस्कृत
पूर्व राज्यपाल ने इस अवसर पर महकवि आचार्य कुमुद विद्यालंकार राष्ट्रीय मंच की ओर से नालंदा महिला महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो जितेंद्र रजक, जी जे कालेज, रामबाग के प्राचार्य प्रो अरविंद कुमार सिन्हा तथा राम लखन सिंह यादव महाविद्यालय, बख़्तियारपुर के प्राचार्य प्रो अवधेश कुमार यादव को ‘राष्ट्र गौरव कुमुद विद्यालंकार स्मृति-सम्मान’ से विभूषित किया। सम्मान-स्वरूप वन्दन-वस्त्र, प्रशस्ति-पत्र और पाँच हज़ार एक सौ रुपए की सम्मान-राशि प्रदान की गयी।
अपने अध्यक्षीय उद्गार में सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कहा कि विगत पंद्रह दिनों में, सम्मेलन के उस संकल्प को पर्याप्त से अधिक बल मिला है, जो हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा घोषित करने के लिए लिया गया है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे कुछ अपवाद के देशों को छोड़कर संसार के सभी राष्ट्रों की अपनी एक राष्ट्र-भाषा है। भारत में भी एक राष्ट्रीय-ध्वज, एक राष्ट्रीय चिन्ह, राष्ट्र-गान, यहाँ तक कि राष्ट्रीय पशु, पक्षी तक भी है, किंतु राष्ट्रभाषा नहीं है। देश की स्वतंत्रता के ७६वर्षों के बाद भी भारत-सरकार के कामकाज की वैधानिक-भाषा, विदेश की एक भाषा बनी हुई है, जो भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए ‘वैश्विक-लज्जा’ का विषय है। इस कलंक को शीघ्र दूर किया जाना चाहिए।
आरंभ में अतिथियों का स्वागत करते हुए, सम्मेलन के उपाध्यक्ष और समारोह के स्वागताध्यक्ष डा कुमार अरुणोदय ने कहा कि जबतक भारत के बच्चे ‘गुड मौर्निंग और गुड ईवनिंग’ बोलते रहेंगे, हमारी राष्ट्र भाषा को उचित मान नहीं मिलेगा। हमारी संस्कृति को गौरव की प्राप्ति तभी होगी जब हम अपनी भाषा को गौरव प्रदान करेंगे।
सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा, भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी बच्चा ठाकुर, वरिष्ठ कवि श्याम बिहारी प्रभाकर, डा पूनम आनन्द, विभारानी श्रीवास्तव, आराधना प्रसाद, शमा कौसर ‘शमा’आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए। मंच का संचालन कवि ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन प्रतियोगिता आयोजन समिति के संयोजक ईं अशोक कुमार ने किया।
प्रतियोगिताओं में सफल विद्यार्थियों के नाम निम्न प्रकार हैं;- श्रुतलेख प्रतियोगिता में अनुराग, स्वीटी तथा शिक्षा रानी को क्रमशः प्रथम स्थान, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। अर्नी आनन्द को प्रोत्साहन पुरस्कार प्राप्त हुआ। निबन्ध-लेखन-प्रतियोगिता में वैष्णवी कुमारी, आकृति आनन्द तथा सुमन कुमारी को क्रमशः प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान, व्याख्यान -प्रतियोगिता में शिवानी कुमारी, शेखर सिंह तथा गणपत हिमांशु को क्रमशःप्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान, काव्य-पाठ-प्रतियोगिता में सदफ आफ़रीन, प्रतिभा प्रधान तथा अद्वितीय ज्ञान को क्रमशः प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान तथा कथा-लेखन-प्रतियोगिता में गणपत हिमांशु, वैष्णवी कुमारी तथा शादाब अख़्तर को क्रमशः प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। प्रथम स्थान प्राप्त विद्यार्थियों को रु ११००/-, द्वितीय स्थान प्राप्त विद्यार्थियों को रु ७००/- तथा तृतीय स्थान प्राप्त विद्यार्थियों को रु ५००/- मात्र की पुरस्कार राशि, पदक एवं प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर, सम्मेलन के प्रबंध मंत्री कृष्ण रंजन सिंह, संगठन मंत्री डा शालिनी पाण्डेय, कलामंत्री पल्लवी विश्वास, सागरिका राय, प्रो समरेंद्र नारायण आर्य, पत्रकार वीरेन्द्र यादव, डा करना पीटर ‘कमल’, निर्मला सिंह, बाँके बिहारी साव, प्रवीर कुमार पंकज, इंदु भूषण सहाय, डा सुषमा कुमारी, उपेंद्र नाथ मिश्र, डा इन्दु पाण्डेय, अनुभा गुप्ता, सूर्य प्रकाश उपाध्याय, ईशा कुमारी, चन्द्र भूषण लाल, मनोज कुमार उपाध्याय, प्रियंका कुमारी, रमा शंकर शुक्ला समेत बड़ी संख्या में हिन्दी-सेवी, हिन्दी-प्रेमी प्रबुद्धजन और छात्रगण उपस्थित थे।
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