दिल्ली में भारतीय युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने रायसीना रोड से चुनाव आयोग की ओर मार्च किया। प्रदर्शनकारियों ने ज्ञानेश कुमार के मुखौटे पहनकर और हाथों में प्रतीकात्मक हथकड़ियां लगाकर विरोध जताया। जंतर-मंतर पर भी प्रदर्शन हुआ। कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिए जाने की खबर है। पटना में चुनाव कार्यालय की ओर बढ़ रहे कांग्रेस कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया गया। चंडीगढ़, लखनऊ और अन्य शहरों में भी चुनाव आयोग के कार्यालयों के बाहर प्रदर्शन हुए।
इन प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में द इंडियन एक्सप्रेस की २३ सितंबर को प्रकाशित खोजी रिपोर्ट है, जिसने चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले करीब 10 महीनों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कम से कम 14 मौकों पर लिखित रूप से आपत्तियां दर्ज कीं। ये आपत्तियां मतदाता सूची, विशेष गहन पुनरीक्षण, नए मतदाताओं के पंजीकरण के फॉर्म-6 और मतदाता आंकड़ों से जुड़ी सूचना प्रौद्योगिकी व्यवस्था सहित कई मामलों से संबंधित थीं।
दो आयुक्तों की लिखित आपत्तियां बनीं विवाद का केंद्र
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आपत्तियां बाहर से लगाए गए राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के भीतर दर्ज लिखित टिप्पणियों और पत्राचार पर आधारित बताई गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़ा अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़ा गया। इसमें आवेदक से उसके, माता-पिता अथवा दादा-दादी के नाम पिछली विशेष गहन पुनरीक्षण वाली मतदाता सूची में होने की जानकारी मांगी गई।
चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज करते हुए सवाल उठाया कि निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित फॉर्म-६ में बदलाव के लिए नियमों में औपचारिक संशोधन आवश्यक था या नहीं। रिपोर्ट के मुताबिक सुखबीर सिंह संधू ने भी इस आपत्ति से सहमति जताई। बाद में संधू ने फिर इस मुद्दे को उठाया और कहा कि दोनों आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद बदलाव वापस नहीं लिया गया।यही घटनाक्रम अब मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका को लेकर विपक्ष के सवालों का प्रमुख आधार है।
मतदाता आंकड़ों पर केंद्रीय नियंत्रण का सवाल
द इंडियन एक्सप्रेस की एक अन्य रिपोर्ट में ईसीआईनेट के जरिए मतदाता आंकड़ों और चुनाव संबंधी कामकाज के केंद्रीकरण को लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों की चिंताओं का उल्लेख किया गया है। सवाल यह था कि यदि मतदाता सूची से जुड़े महत्वपूर्ण काम केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी व्यवस्था के माध्यम से नियंत्रित होते हैं तो राज्यों और स्थानीय स्तर के निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों की वैधानिक भूमिका कितनी प्रभावी रह जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक इस मुद्दे पर भी दोनों चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति दर्ज की और अपनी चिंताएं उच्च स्तर तक पहुंचाईं।
गोवा के 97 मतदाताओं का मामला
इस विवाद को समझने के लिए गोवा का मामला भी महत्वपूर्ण है। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार गोवा में 97 ऐसे मतदाताओं के नाम थे जिन्हें स्थानीय स्तर पर जांच के बाद मतदाता सूची में शामिल किए जाने योग्य पाया गया था, लेकिन तकनीकी प्रक्रिया के कारण उनके नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं हो सके।
रिपोर्ट के मुताबिक गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने इस समस्या के समाधान के लिए चुनाव आयोग से कई बार संपर्क किया। स्थानीय स्तर पर योग्य पाए गए इन मतदाताओं के नाम वापस जोड़ने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी व्यवस्था में आवश्यक विकल्प उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया। रिपोर्ट के अनुसार अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने के समय ये नाम उसमें नहीं थे। हालांकि बाद की प्रक्रिया में इन मामलों में कार्रवाई किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। इस मामले ने एक बुनियादी सवाल खड़ा किया—यदि स्थानीय निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी किसी व्यक्ति को पात्र मानता है तो उसे मतदाता सूची में शामिल करने के रास्ते में केंद्रीय तकनीकी व्यवस्था बाधा क्यों बने?
क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ने आपत्तियों की अनदेखी की ?
यही विवाद का सबसे संवेदनशील प्रश्न है। द इंडियन एक्सप्रेस की जांच में यह तथ्य सामने रखा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कई मामलों में लिखित आपत्तियां दर्ज कीं और उनके अनुसार उनकी चिंताओं का समाधान नहीं हुआ। रिपोर्ट और उसके बाद प्रकाशित संपादकीय में इस स्थिति को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। लेकिन उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर यह कहना कि ज्ञानेश कुमार ने व्यक्तिगत रूप से और जानबूझकर दोनों चुनाव आयुक्तों की सभी आपत्तियों को खारिज कर दिया, एक स्थापित तथ्य के रूप में पेश नहीं किया जा सकता।
चुनाव आयोग ने रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि आयोग के सदस्यों के बीच अलग-अलग विचार, टिप्पणियां और सुझाव निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग का कहना है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। यानी विवाद का असली केंद्र यह नहीं है कि दोनों आयुक्तों ने आपत्ति की या नहीं—रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने की। मूल सवाल यह है कि उन लिखित आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई, अंतिम निर्णय किस प्रक्रिया से हुए और क्या दोनों आयुक्तों की असहमति का पर्याप्त संस्थागत समाधान किया गया।
सड़क से संसद तक पहुंचा मामला
कांग्रेस ने इन घटनाक्रमों को चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और मतदाता अधिकारों से जोड़ते हुए देशव्यापी आंदोलन का आह्वान किया। आज के प्रदर्शनों में ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग प्रमुख रही। मामला अब संसद तक पहुंचने की तैयारी में भी है। विपक्षी सांसद मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए दोनों सदनों में प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि किसी संवैधानिक पदाधिकारी को हटाने की प्रक्रिया केवल राजनीतिक मांग से पूरी नहीं होती; इसके लिए संविधान में निर्धारित संसदीय प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है।
इस पूरे विवाद में एक तरफ चुनाव आयोग का दावा है कि उसके अंतिम निर्णय सर्वसम्मत हैं, दूसरी तरफ इंडियन एक्सप्रेस की दस्तावेज आधारित पड़ताल में दो चुनाव आयुक्तों की बार-बार दर्ज की गई आपत्तियां सामने आई हैं। इसलिए आज के देशव्यापी प्रदर्शन का सबसे बड़ा सवाल यही है कि चुनाव आयोग के भीतर दर्ज 14 आपत्तियों का वास्तविक निपटारा कैसे हुआ और मतदाता सूची जैसे संवेदनशील विषयों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और सामूहिक रही। विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया के बीच यह विवाद अब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, उसकी आंतरिक निर्णय व्यवस्था और मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर राष्ट्रीय बहस का रूप ले चुका है।
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