इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय परीक्षा सुधार टास्क फोर्स गठित कर व्यापक सुधार प्रक्रिया की शुरुआत का संकेत दिया है और कानून में संशोधन करने जा रही है। सरकार का दावा है कि एक ओर कानून को कठोर बनाया जाएगा, वहीं दूसरी ओर परीक्षा प्रणाली को तकनीक आधारित, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने की दिशा में संस्थागत सुधार किए जाएंगे।
सरकार के सामने पिछले कई सप्ताह से राष्ट्रीय स्तर पर छात्रों का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा था। विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक के आरोपों को लेकर देश के कई हिस्सों में आंदोलन हुए। विपक्ष ने भी संसद से लेकर सड़क तक सरकार को घेरा। बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच सरकार ने पहले आंदोलनकारी संगठनों से वार्ता की, उसके बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया और आंदोलन समाप्त होने की घोषणा हुई। अब सरकार विधायी और प्रशासनिक दोनों मोर्चों पर सक्रिय दिखाई दे रही है ।
कानून में होंगे और कड़े प्रावधान
सरकार सोमवार को जो संशोधन विधेयक पेश करने जा रही है, उसमें संगठित पेपर लीक गिरोहों, प्रश्नपत्र चोरी, डिजिटल हैकिंग, परीक्षा में तकनीकी छेड़छाड़ तथा संगठित नकल के मामलों में और कठोर दंड का प्रावधान किया जाएगा। इसमें 10 करोड़ रुपये तक का जुर्माना और 10 साल तक जेल की सजा का प्रावधान है। इसके अलावा जांच एजेंसियों की शक्तियों, अभियोजन प्रक्रिया तथा परीक्षा सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को भी मजबूत करने की तैयारी है। सरकार का कहना है कि परीक्षा माफिया के खिलाफ मौजूदा कानून को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता महसूस की गई है।
नीलेकणि के नेतृत्व में बनेगा सुधारों का रोडमैप
सरकार ने केवल कानून कड़ा करने तक खुद को सीमित नहीं रखा है। प्रधानमंत्री ने रविवार को छह सदस्यीय उच्चस्तरीय परीक्षा सुधार टास्क फोर्स के गठन की घोषणा की, जिसकी अध्यक्षता नंदन नीलेकणि करेंगे। समिति में इसरो के पूर्व अध्यक्ष एस. सोमनाथ, पूर्व आईबी निदेशक तपन डेका, आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामकोटि, पूर्व शिक्षा सचिव अनीता करवाल तथा वरिष्ठ प्रशासक अमृत लाल मीणा को शामिल किया गया है। सरकार का मानना है कि तकनीक, सुरक्षा, प्रशासन और शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञ मिलकर ऐसी परीक्षा प्रणाली का खाका तैयार करेंगे जिसमें पेपर लीक और संगठित धोखाधड़ी की संभावनाएं न्यूनतम हों।
समिति इन बिंदुओं पर करेगी काम
टास्क फोर्स को प्रश्नपत्रों की डिजिटल एवं भौतिक सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों की निगरानी व्यवस्था, अभ्यर्थियों के सुरक्षित सत्यापन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसियों की संरचना में सुधार तथा परीक्षा संचालन से लेकर परिणाम तक पूरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के सुझाव देने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। सरकार चाहती है कि भविष्य की सभी प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक समान और अधिक विश्वसनीय व्यवस्था विकसित की जाए।
विपक्ष भी करेगा सरकार को घेरने की कोशिश
मानसून सत्र के दूसरे सप्ताह में परीक्षा प्रणाली का मुद्दा संसद के भीतर भी प्रमुख राजनीतिक विषय बनने जा रहा है। विपक्ष सरकार से पेपर लीक की घटनाओं, परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तथा छात्रों के भविष्य से जुड़े सवालों पर जवाब मांगने की तैयारी में है। ऐसे में सरकार संशोधन विधेयक और विशेषज्ञ समिति—दोनों के जरिए यह संदेश देना चाहती है कि वह केवल तत्काल संकट से निपटने तक सीमित नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक सुधारों की दिशा में भी कदम उठा रही है।
चुनावी साल में युवाओं का भरोसा लौटाने की चुनौती
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब अगले वर्ष देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसके अलावा पंजाब में भी चुनावी माहौल बनने लगा है। दोनों राज्यों में युवाओं और प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थियों की बड़ी संख्या राजनीतिक दलों के लिए अहम मानी जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हाल के छात्र आंदोलन ने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बना दिया है। ऐसे में सरकार के लिए केवल आंदोलन समाप्त कराना पर्याप्त नहीं था, बल्कि यह भरोसा दिलाना भी जरूरी हो गया था कि भविष्य में पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं पर प्रभावी रोक लगाने के लिए कानूनी और संस्थागत दोनों स्तरों पर व्यापक बदलाव किए जाएंगे।
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