कराची, हैदराबाद, लरकाना, सुक्कुर और सिंध के अन्य शहरों में हुए प्रदर्शनों के दौरान PPP नेताओं ने सिंधु जल संधि को 1960 का बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौता बताते हुए भारत से इसे बहाल करने की मांग की। प्रदर्शनकारियों ने ‘मरसूं मरसूं, सिंधु न देसूं’ जैसे नारे लगाए और दावा किया कि सिंधु नदी का पानी पाकिस्तान की कृषि और अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है।
PPP अध्यक्ष बिलावल भुट्टो पहले भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि पाकिस्तान अपने जल अधिकारों की रक्षा के लिए हर उपलब्ध विकल्प अपनाएगा। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने भी कहा कि यदि पानी रोकने की नीति जारी रही तो इसका क्षेत्रीय शांति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
उधर भारत का आधिकारिक रुख पहले की तरह कायम है। नई दिल्ली का कहना है कि सिंधु जल संधि को ‘स्थगित’ रखने का निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है और यह पाकिस्तान द्वारा सीमा पार आतंकवाद को समर्थन दिए जाने की पृष्ठभूमि में लिया गया है। भारत ने स्पष्ट किया है कि आतंकवाद और बातचीत या आतंकवाद तथा सामान्य द्विपक्षीय संबंध साथ-साथ नहीं चल सकते। सरकार का कहना है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद के ढांचे पर प्रभावी और सत्यापित कार्रवाई नहीं करता, तब तक इस नीति में बदलाव की संभावना नहीं है।
गौरतलब है कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को प्रभावी रूप से स्थगित करने का निर्णय लिया था। इसके बाद से दोनों देशों के बीच जल विवाद एक प्रमुख कूटनीतिक मुद्दा बन गया है। पाकिस्तान इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिश कर रहा है, जबकि भारत का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है और आतंकवाद के खिलाफ उसकी नीति में किसी प्रकार की नरमी की गुंजाइश नहीं है।
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