रामधारी प्रसाद ‘विशारद’ के उद्यम से हुई थी साहित्य सम्मेलन की स्थापना

मनीषी विद्वान, उदारमना व्यवसायी और हिन्दी के अनन्य भक्त रामधारी प्रसाद 'विशारद' के सदप्रयास और सक्रियता से ही वर्ष 1919 में बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना हुई थी। वे इसके मुख्य सूत्रधार थे। सबसे पहले इनके ही मन में प्रांतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना का विचार आया और देशरत्न डा राजेंद्र प्रसाद की स्वीकृति प्राप्त कर हिन्दी सेवियों और हिन्दी-प्रेमियों का आह्वान किया।

रामधारी प्रसाद 'विशारद' के चित्र पर माल्यार्पण करते बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ अनिल सुलभ व अन्य
Written By : डेस्क | Updated on: June 11, 2025 8:09 pm

मुज़फ़्फ़रपुर नगरपालिका के तत्कालीन अध्यक्ष और लोकप्रिय समाजसेवी बाबू वैद्यनाथ प्रसाद सिंह की अध्यक्षता में, 19 अक्टूबर, 1919 को मुज़फ़्फ़रपुर के हिंदू भवन में विद्वानों और हिन्दी-प्रेमियों की बैठक हुई, जिसमें साहित्य सम्मेलन की स्थापना का निर्णय लिया गया। सम्मेलन के संचालन और उन्नयन में रामधारी प्रसाद ‘विशारद’ का सर्वश्रेष्ठ योगदान था। हिन्दी के प्रचार-प्रसार और उन्नयन में अपने तपो प्रसूत संकल्प के लिए वे सदा स्मरण किए जाते रहेंगे।

मनी 125वीं जयंती, आयोजित हुई लघुकथा-गोष्ठी

यह बातें, बुधवार को,  ‘रामधारी प्रसाद ‘विशारद’ जी की 125वीं जयंती पर साहित्य सम्मेलन में आयोजित समारोह और लघुकथा गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि विशारद जी, भागलपुर के बौंसी में आहूत हुए, सम्मेलन के १९वें अधिवेशन के सभापति चुने गए थे। इसके पूर्व वे अनेक वर्षों तक सम्मेलन के प्रधानमंत्री और उपसभापति सहित अनेक पदों पर रहकर सम्मेलन की अप्रतिम सेवा की।

महिला आयोग की अध्यक्ष प्रो अप्सरा का हुआ अभिनन्दन

डा सुलभ ने इस अवसर पर, बिहार राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष बनाए जाने के उपलक्ष्य में, सम्मेलन की प्रवक्ता और विदुषी पत्रकार प्रो अप्सरा को सम्मेलन की ओर से अंग-वस्त्रम और पुष्पहार पहनाकर अभिनन्दन किया। करतल-ध्वनि से साहित्यकारों ने उन्हें बधाई दी। डा सुलभ ने आशा व्यक्त की कि अप्सरा जी शासन की ओर से प्राप्त इस मूल्यवान अवसर को महिला-सशक्तिकरण की दिशा में अधिकतम सदुपयोग करेंगी।

प्रो अप्सरा ने सम्मेलन अध्यक्ष के प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा कि साहित्य सम्मेलन से वो बहुत पूर्व से जुड़ी हुई हैं और सम्मेलन की प्रवक्ता के रूप में मुझे सम्मेलन से प्रचूर सम्मान मिला है। उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि यदि सम्मेलन चाहे तो महिला आयोग बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के साथ मिलकर महिलाओं की जागरूकता के लिए संगोष्ठियों का आयोजन करना चाहेगा। वरिष्ठ लेखक इन्दु भूषण सहाय, ‘अनुपम उपहार’ के संपादक रणधीर कुमार मिश्र, बाँके बिहारी साव, नीरव समदर्शी, प्रवीर कुमार पंकज, चंदा मिश्र आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

इस अवसर पर आयोजित लघुकथा गोष्ठी में, डा पूनम आनन्द ने ‘संयोग’, विभा रानी श्रीवास्तव ने ‘स्फुर दीप्ति’, शमा कौसर ‘शमा’ ने ‘ग़ज़ल’, कुमार अनुपम ने ‘दरिद्र-भोज’, ईं अशोक कुमार ने ‘रिश्ते-कब’, अरविंद कुमार वर्मा ने ‘क्या गिरा?’ तथा नरेन्द्र कुमार ने ‘धन पिपासु’ शीर्षक से लघुकथा का पाठ किया। मंच का संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया। सम्मेलन के प्रशासी अधिकारी सूबेदार नन्दन कुमार मीत, डा दुखदमन सिंह, अश्विनी कुमार कविराज, अभिषेक कुमार, कुमारी मेनका, सुधीर कुमार आदि प्रबुद्धजन उपस्थित थे।

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3 thoughts on “रामधारी प्रसाद ‘विशारद’ के उद्यम से हुई थी साहित्य सम्मेलन की स्थापना

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