प्रकृति के महान चितेरे और मानवतावादी कवि थे सुमित्रानन्दन पंत

 हिन्दी काव्य-साहित्य में छायावाद-युग के प्रमुख स्तंभ के रप में परिगणित महाकवि सुमित्रानन्दन पंत प्रकृति के महान चितेरे और मानवतावादी कवि थे। उनकी रचनाओं के विराट विस्तार में प्रकृति का चित्ताकर्षक चित्रण तो है ही, समाज की पीड़ा के साथ मानवतावादी समाजवाद भी है, जो प्रगतिवाद के रास्ते से अध्यात्म-वाद पर संपन्न और संपूर्ण होता है।

Written By : डेस्क | Updated on: May 20, 2025 6:30 pm

सुमित्रानन्दन पंत की जयंती पर ये बातें मंगलवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में पंत-जयंती और कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि, पंत जी की रचना-प्रक्रिया को समझने के लिए, उनके जीवन के चार काल-खंडों का अलग-अलग अध्ययन करना आवश्यक है। कवि अपने यौवन में प्रेम और प्रकृति तथा उनके उदात्त सौंदर्य के चितेरे के रूप में दिखाई देते हैं। इसके पश्चात उन पर, साम्यवाद के जनक मार्क्स और प्रगतिवाद का प्रभाव दिखता है। फिर वे महात्मा-गाँधी से प्रभावित होकर सेवा और मानवता-वादी दृष्टिकोण के ध्वज-वाहक दिखते हैं। और, जीवन के चौथेपन में उन पर महर्षि अरविन्दो का प्रभाव पड़ता है, जिसमें उनकी आध्यात्मिक-चेतना उर्द्धगामी होती दिखाई देती है। उन्हें भारत सरकार के पद्म-भूषण अलंकरण, साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। वे साहित्य सम्मेलन की सर्वोच्च मानद उपाधि ‘विद्या-वाचस्पति’ से भी विभूषित हुए थे।

इस अवसर पर पाक्षिक पत्रिका ‘दूसरा मत’ के विशेष ग़ज़ल-अंक का लोकार्पण भी किया गया। पत्रिका के इस अंक में अनेक शायरों की ग़ज़लें भी प्रकाशित हुई हैं और शायरी की इस खूबसूरत विधा पर अनेक विद्वानों के आलेख भी सम्मिलित किए गए हैं। पत्रिका के संपादक और शायर ए आर आज़ाद ने पत्रिका के साहित्यिक अवदानों पर चर्चा की।

इसके पूर्व अतिथियों का अभिनन्दन करते हुए सम्मेलन के साहित्यमंत्री भगवती प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि यों तो हिन्दी काव्य के इतिहास में अनेक आन्दोलन हुए, किंतु छायावाद को हिन्दी काव्य का स्वर्ण युग कहा जाता है। इस युग ने काव्य की दिशा बदल दी। सुमित्रानन्दन पंत जी इस युग के गौरव स्तम्भ हैं। सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद, डा मधु वर्मा, प्रो रत्नेश्वर सिंह, बच्चा ठाकुर तथा विभा रानी श्रीवास्तव ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरंभ चंदा मिश्र ने वाणी-वंदना से किया। वरिष्ठ शायर आरपी घायल, गीतिधारा के चर्चित कवि आचार्य विजय गुंजन, ओम् प्रकाश पाण्डेय ‘प्रकाश’, चंद्रिका ठाकुर ‘देशदीप’, राजेश दूबे, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, कुमार अनुपम, शायरा शमा कौसर ‘शमा’, डा वीणा, डा प्रतिभा रानी, सुधा पाण्डेय, उत्तरा सिंह, सदानन्द प्रसाद, ईं अशोक कुमार, रौली कुमारी, सुनीता रंजन, शंकर शरण आर्य, प्रेम प्रकाश, श्रुत कीर्ति अग्रवाल, आर्चना भारती नागेन्द्र, बिन्देश्वर प्रसाद गुप्त, भास्कर त्रिपाठी आदि कवियों और कवयित्रियों ने भी काव्य-पाठ किया। मंच का संचालन कवि ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।

इस अवसर पर, वरिष्ठ व्यंग्यकार बाँके बिहारी साव, प्रवीर कुमार पंकज, इंदु भूषण सहाय, डा चन्द्रशेखर आज़ाद, वीरेन्द्र यादव, दुःख दमन सिंह, नन्दन कुमार मीत तथा सुमन कुमार समेत बड़ी संख्या में कविगण और सुधी श्रोता उपस्थित थे।

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