हमने यह देखा है कि भारत सहित दुनिया के सभी देशों में सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जनसंचार के विभिन्न साधन जैसे मोबाइल, इंटरनेट, टीवी, रेडियो आदि के माध्यम से इस महामारी से हुई क्षति को न्यूनतम रखने में हमें सहायता मिली है।
अब शिक्षा व्यवस्था में आभासी मंच का योगदान पहले से अधिक
एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि कोविड महामारी के दौरान ऑनलाइन माध्यमों से विभिन्न ऐप के द्वारा तथा अनेक सैटेलाइट एवं यूट्यूब चैनलों के द्वारा और फेसबुक लाइव आदि के माध्यम से हमने आभासी मंचों का उपयोग कर अध्ययन और अध्यापन कार्य को बाधित नहीं होने दिया। ऐसे में यह तो तय है कि अब भविष्य की शिक्षा व्यवस्था में आभासी मंच का योगदान पहले से कहीं अधिक होने वाला है।
हिंदी साहित्य में फिल्मों की सहायता से पढ़ाना समय की मांग
अतः मेरा मानना है कि साहित्य विशेषकर हिंदी साहित्य में फिल्मों (Hindi cinema) की सहायता से शिक्षण कार्य संपन्न कराना अब समय की मांग है। हिंदी तथा विभिन्न भाषाओं की ऐसी अनेक कालजयी कृतियां हैं, जिन पर फिल्में बनी हैं और हम उन फिल्मों की सहायता से से संबंधित कृतियों का शिक्षण अत्यंत सरलता से विद्यार्थी को करा सकते हैं।
शिक्षण के क्षेत्र में ये फिल्में निभा सकती हैं महत्वपूर्ण भूमिका
यह भी एक सर्व स्वीकृत तथ्य है कि सुनी हुई बात की तुलना में देखी हुई बात अधिक प्रभावशाली तरीके से विद्यार्थी तक पहुंचाई जा सकती है। इसे ध्यान में रखते हुए हिंदी साहित्य में प्रेमचन्द की कहानियों सद्गति, शतरंज के खिलाड़ी, हीरा मोती पर इन्हीं नामों से बनी फिल्में तथा उनके उपन्यास गबन, गोदान, कर्मभूमि तथा अन्य लेखकों की कहानियों और उपन्यासों, नाटकों आदि पर आधारित फिल्मों जैसे गाइड, सूरज का सातवां घोड़ा, तीसरी कसम, नदिया के पार, थ्री ईडियट्स, ब्लैक फ्राइडे, छावा, रामायण महाभारत आदि पर आधारित या इनसे प्रभावित फिल्में (Hindi cinema) और टीवी, ओटीटी, इंटरनेट आदि के कार्यक्रम शिक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। फिल्मी गानों से खेल खेल में हमारी संस्कृति, पर्व आदि का ज्ञान देश दुनिया के अहिंदी भाषी लोगों ओर विदेशियों को आसानी से कराया जा सकता है और उनमें जागरूकता पैदा की जा सकती है। यह फ़िल्मों की ताक़त है कि अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा को शाहरुख खान का सोनेरिटा संवाद बोलकर भारतवासियों को प्रभावित करना पड़ता है।
फिल्मों ने किए हैं कई सामाजिक परिवर्तन
हिन्दी फ़िल्मों (Hindi cinema) ने कई सामाजिक परिवर्तन किए हैं, जिनका अध्ययन किया जाना चाहिए। जैसे हरित क्रांति को संभव करने में मनोज कुमार की उपकार फिल्म की भूमिका, बेरोजगार युवा को वाणी देने में आवारा फिल्म की भूमिका, खेलों विशेषकर हॉकी को पुनः सफल बनाने में चक दे इंडिया की भूमिका, कुश्ती के लिए दंगल, फुटबाल के लिए गोल, बॉक्सिंग के लिए मेरीकॉम, क्रिकेट के लिए धोनी आदि फ़िल्में, डाकुओं के आत्मसर्पण में दो आंखें बारह हाथ फ़िल्म की भूूमिका, रोगों के प्रति जागरूकता पैदा करने में दर्द का रिश्ता, अंखियों के झरोखे से, तारे जमीं पर, ब्लैक, पा आदि फ़िल्मों की भूमिका आदि महत्वपूर्ण हैं। शिक्षण के लिए अनेक फिल्मी गानों को सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया जा सकता है। पहेलीनुमा गाने जैसे ईचक दाना बीचक दाना से तर्क शक्ति, गिनती सिखाने के लिए एक दो तीन, माह के नाम सिखाने के लिए तू मायके मत जइयो, विभिन्न पर्वों तथा देशप्रेम के महत्व को सिखाने तथा विभिन्न संस्कारों को दर्शाने के असंख्य गीतों से भारतीय संस्कृति का ज्ञान बड़ी आसानी से दुनिया में प्रसारित किया जा सकता है। इसके अलावा अनेक फ़िल्मों की दमदार कहानियों से विद्यार्थियों में सकारात्मक सोच, कभी हार न मानने की जिद तथा सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा भरी जा सकती है। अगर फ़िल्मों को शिक्षण के शानदार माध्यम के रूप में इस्तेमाल करें तो अत्यन्त प्रभावशाली परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

(प्रो. पुनीत बिसारिया बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी में हिंदी के प्रोफेसर हैं और फिल्मों पर लिखने के लिए जाने जाते हैं। वेद फिल्म फाउंडेशन ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं तथा गोल्डेन पीकॉक इंटरनेशनल फिल्म प्रोडक्शंस एलएलपी के नाम के फिल्म प्रोडक्शन हाउस के सीईओ हैं।)
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