Hindi Cinema : चाहे वह आवारा, गाइड, बरसात हो या फिर जय संतोषी मां, शोले, मैंने प्यार किया और बाहुबली (Baahubali) हो, जनता ने नवीनता को सर आंखों पर रखा है लेकिन इतनी छोटी और सीधी सी बात हिन्दी फिल्मकार (Hindi Filmmaker) नहीं समझते। वे भेड़चाल(herd mentality) से अपनी भद पिटवाते रहते हैं।
पार्ट दो, तीन, चार बनाने की अंधी दौड़
आजकल सीज़न या पार्ट दो तीन चार पांच बनाने की अंधी दौड़ चल रही है। पुरानी फिल्मों की धूल झाड़ पोंछकर शोले, तेरे नाम, सनम तेरी कसम, और तुम्बाड, पुष्पा, स्त्री, एनीमल जैसी न जाने कितनी अपेक्षाकृत नई फिल्मों के दूसरे संस्करण लाने की अंधी होड़ मची हुई है।
बाहुबली क्या हिट हुई पौराणिकता के आधार पर फिल्मों की झड़ी लग गई है और अब स्त्री के दो सीज़न क्या हिट हुए, हॉरर जॉनर की झड़ी लगने वाली है। ऐसे में मौलिकता की ऐसी तैसी होनी तय है और फिल्मों के अंत के साथ ऐसा घिनौना खिलवाड़ हो रहा है कि बस पूछिए ही मत।
मौलिक और ताजा देखना चाहती है जनता
Hindi Cinema के इस ट्रेंड की फिल्मों का अंजाम निश्चित ही बुरा होना है और लुट पिटकर ये सब फिर कोई नए फार्मूले के हिट हो जाने पर उसके पीछे दौड़ते नज़र आएंगे लेकिन ये नकल की अंधी दौड़ क्या कभी रुकेगी और हिन्दी पट्टी की आम जनता को कुछ ताज़ा और मौलिक कभी मिलेगा क्या? ये सवाल नकलची हिन्दी फिल्मकारों (Hindi Filmmakers) से बार- बार पूछा जाना चाहिए।

(प्रो. पुनीत बिसारिया बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी में हिंदी के प्रोफेसर हैं और फिल्मों पर लिखने के लिए जाने जाते हैं। वे द फिल्म फाउंडेशन ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं तथा गोल्डेन पीकॉक इंटरनेशनल फिल्म प्रोडक्शंस एलएलपी के नाम के फिल्म प्रोडक्शन हाउस के सीईओ हैं।)
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