पठनीय है पुलिस अधिकारी केशव भारद्वाज का उपन्यास “मैं, मानिनी और प्रिया”

किताब का हिसाब : "मैं मानिनी और प्रिया" केशव भारद्वाज जी का हाल ही में प्रकाशित हिंदी उपन्यास है. दिल्ली पुलिस के अधिकारी केशव जी बहुत अर्थों में विशिष्ट हैं. उन्होंने अपनी मातृभाषा भोजपुरी में, मैथिली में और अब हिंदी में उपन्यास लिखा है. इनका लिखा यात्रा वृतान्त शीघ्र ही प्रकाशित होगा. केशव भारद्वाज बहुत दिनों तक विदेश मंत्रालय में अपने कार्यकाल के दौरान दक्षिण अफ्रीका और यूगांडा में भी कार्यरत रहे हैं . केशव की भाषा सरल और रोचक है . इन्होंने उपन्यास में क्षेत्रीय भाषा भोजपुरी के शब्दों का पूरा व्यवहार किया है.ऐसा एहसास होता है कि अगर उन भोजपुरी मुहावरों और शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता तो शायद भाव अधूरे रह जाते.

Written By : प्रमोद कुमार झा | Updated on: May 22, 2025 7:27 am

उपन्यास एक रोचक क्रम में आगे बढ़ता है. उत्तर बिहार के छोटे से शहर से निकली दो युवतियां महानगर के उस ‘पार्टी’ संस्कृति का अन्यतम हिस्सा बन जाती है .मुक्त और उन्मुक्त जीवन की तलाश में उनका अपना अस्तित्व और स्त्रीत्व दांव पर लग जाता है पर उन्हें इसका अंदाजा भी नहीं होता.दिलचस्प ये है कि महानगर के उस पंच सितारा संस्कृति में भी किसी भी सुंदर महिला की स्थिति वास्तव में ‘नगरवधू’ जैसी ही लगती है. आत्मकथ्यात्मक शैली में लिखे इस उपन्यास को पढ़कर कभी कभी भ्रम होने लगता है कि कही यह उपन्यास लेखक की आत्मकथा तो नहीं!

उपन्यास के कई छोटे छोटे पात्र भी प्रभावित करते हैं क्योंकि उनकी भाव भंगिमा, भाषा, रुचियाँ, चरित्र और कमजोरियां उस विशेष वर्ग के लोगों की पहचान दिला देती हैं!एक ऐसा ही पात्र है ‘पुरी’!मानवीय संबंधों, सरोकारों, संवेदनाओं का स्थान व्यावाहारिकता ,स्वार्थ और भौतिक सुख ने ले लिया है. विभिन्न चैनलों पर दिखाए जाने वाले पॉपुलर धारावाहिक की तरह केशव भारद्वाज के इस उपन्यास में प्रायः कोई भी शादी सफल नहीं है, कोई पत्नी या पति अपने साथी के प्रति वफादार नहीं है.एक दो जगह केशव ने इशारा किया कि महानगर की ये पार्टियां ‘संपर्क बढ़ाने’,’व्यापार करने’ अथवा कोई काम निकलवाने के लिए संपर्क स्थल की तरह हैं. पार्टी में ‘रंगीन तितलियों’ के माध्यम से उन कार्यों को अंजाम दिया जाता है. आर्थिक लाभ, सम्पर्क और असन्तुष्ट वैवाहिक जीवन के परिणामस्वरूप ज़िंदगी एक नुमाइश बन जाती है। लेखक के दोनों प्रमुख पात्र प्रिया और मानिनी भी संयोगवश उनके गृह जिले और शहर की ही मूल निवासी हैं .

उपन्यास आधुनिक जीवन शैली के एक कारुणिक पक्ष की ओर इशारा करती है .पूरा उपन्यास का वर्णन बिल्कुल सिनेमा की तरह लगता है. इस उपन्यास को जल्दी में समाप्त कर दिया गया . छपाई में प्रूफरीडिंग पर प्रकाशक ने ध्यान दिया होता तो बेहतर नतीजा मिलता.प्रायः अगले संस्करण में ध्यान दिया जाएगा! पुस्तक पठनीय और रोचक है.

पुस्तक:मैं मानिनी और प्रिया

लेखक: केशव भारद्वाज  पृष्ठ:146, मूल्य:रु 175

प्रकाशक: प्रभाकर प्रकाशन, नई दिल्ली

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)

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