स्वतंत्रता-संग्राम और हिन्दी के महान योद्धा थे महाकवि रामदयाल पाण्डेय :डा अनिल सुलभ

स्वतंत्रता-संग्राम और हिन्दी के महान योद्धा थे महाकवि रामदयाल पाण्डेय। सिद्धांत और आदर्शों से कभी समझौता नहीं किया। स्वतंत्रता-सेनानी पेंशन को भी यह कहते हुए ठुकरा दिया कि "भारत माता की सेवा पुत्र की भाँति की, किसी कर्मचारी की तरह नहीं, कि सेवा-शुल्क लूँ"। सरकार को हिन्दी-हित के विरुद्ध जाते देखा तो राष्ट्रभाषा परिषद के निदेशक-सह-अध्यक्ष का पद त्यागने में एक क्षण भी नहीं लगाया। पाँच-पाँच बार सम्मेलन के अध्यक्ष चुने गए।

Written By : डेस्क | Updated on: August 6, 2025 7:43 pm

महाकवि रामदयाल पाण्डेय ने सम्मेलन-भवन के निर्माण में एक श्रमिक की भाँति अपने सिर पर ईंट-गारे ढोए और सम्मेलन को साहित्यकारों का तीर्थ-स्थल बना दिया। यह बातें बुधवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में, महाकवि रामदयाल पाण्डेय की जयंती पर आयोजित कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही।

डा सुलभ ने कहा कि, आज जब हर कोई एक छोटा पद पाने के लिए भी न जाने क्या-क्या करता है, पाण्डेय जी ने राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त पद का त्याग कर दिया। आदर्श और सिद्धांत, राष्ट्र और राष्ट्र-भाषा जैसे तत्त्व उनके लिए और किसी भी वस्तु अथवा पद से बहुत बड़े थे। उनके मूल्य पर उन्हें कुछ भी स्वीकार्य नहीं था।

अतिथियों का स्वागत करते हुए, सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा ने कहा कि, पाण्डेय जी राष्ट्र और राष्ट्रभाषा के प्रति पूर्ण समर्पित और अत्यंत आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे। जीवन की संध्या में भी, उनकी अकुंठ प्रतिभा और ओज, उनके मुख-मंडल और वाणी से भासित होता था। उनका चरित्र और व्यक्तित्व, दोनों ही अनुकरणीय था। उनकी मानसिक वृत्ति उन्नायक थी। उन्होंने अपने काव्य से मानव-मन को प्रेरणा दी। वे परंपरावादी चिंतक थे। साहित्य सम्मेलन उनका ऋणी है।

दूरदर्शन बिहार के पूर्व कार्यक्रम-प्रमुख डा ओम् प्रकाश जमुआर, महाकवि के प्रपौत्र अभिषेक कुमार पाण्डेय, विभारानी श्रीवास्तव, ईं आनन्द किशोर मिश्र, प्रो सुशील कुमार झा तथा इंदु भूषण सहाय ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

इस अवसर पर आयोजित कवि-गोष्ठी का आरंभ चंदा मिश्र की वाणी-वंदना से हुआ। वरिष्ठ कवि सुनील कुमार ने अपनी रचना पढ़ते हुए कहा कि “तुम आ के ठहरे थे इन दिल की बस्तियों में कहीं/ कभी तो पास थे अब दूर हो चुके हो तुम / हमारी नज़रों से यूँ ही नहीं गिरे हो तुम/हमारा दर्द तो शायद ही पढ़ सके हो तुम।”

चंपारण से पधारे वरिष्ठ कवि प्रसाद रत्नेश्वर ने अपनी पीड़ा इन पंक्तियों में व्यक्त की कि -“ऐसे हालात में भी हमको जीना है/ छेद है नाव में और बाढ़ का महीना है/ धूप के ही साए में ऊम्र सारी बीत गयी/ मुफलिसी में कौन किसका पोंछता पसीना है”। काव्य की ‘दोहा’ विधा में विशिष्ट स्थान बना चुके युवा कवि सूर्य प्रकाश उपाध्याय ने कवियों से अपेक्षा की कि “कविता के सुर में भरो, जन-जीवन की तान/ कवि! कलम से कर सदा, मानव का कल्याण।”

कवि अर्जुन प्रसाद सिंह, डा आर प्रवेश, शंकर शरण आर्य, अश्विनी कविराज, कुमारी मेनका, इन्दुभूषण सहाय आदि कवियों और कवयित्रियों ने भी अपनी रचनाओं से श्रोताओं की तालियाँ बटोरी । मंच का संचालन कवि ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्णरंजन सिंह ने किया।

सिकन्दर प्रसाद, मोहम्मद फ़हीम, नन्दन कुमार मीत, सुजीत कुमार, डौली कुमारी, बीरेन्द्र प्रसाद आदि काव्य-प्रेमी उपस्थित थे।

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9 thoughts on “स्वतंत्रता-संग्राम और हिन्दी के महान योद्धा थे महाकवि रामदयाल पाण्डेय :डा अनिल सुलभ

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