कार्यक्रम में प्रमुख वक्ताओं के रूप में गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलपति सुदर्शन आयंगर, वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता रजनी बख्शी और प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता रेनाना झाबवाला ने अपने विचार व्यक्त किए। आईजीएनसीए के डीन (प्रशासन) एवं कला निधि विभाग के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़ ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। वक्ताओं ने इला भट्ट के जीवन, उनके सामाजिक कार्यों तथा ‘सेवा’ आंदोलन के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रदान करने के उनके प्रयासों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने इस पुस्तक को महिला श्रम, शांति और समावेशी विकास पर गंभीर चिंतन का दस्तावेज़ बताया।
रामबहादुर राय ने कहा कि यह पुस्तक भाषणों का संकलन है, लेकिन इसमें सिर्फ बोले हुए शब्द नहीं है, बल्कि गहन अनुभव हैं और ये अनुभव आकाश जैसा है। गांधीजी और कस्तूरबा जो प्रयोग महिलाओं के बीच करना चाहते थे, उसे इला भट्ट ने महिलाओं के बीच किया और आगे बढ़ाया। इस पुस्तक में सिर्फ भारतीय महिलाओं की चिंता नहीं है, बल्कि दक्षिण-एशियाई महिलाओं की चिंता है। उन्होंने कहा कि माइक्रोफाइनेंस इला जी की सबसे बड़ी देन है। वे दिमाग़ से कम और दिल से ज़्यादा काम करती थीं। श्री रामबहादुर राय ने कहा, यह बहुत महत्त्वपूर्ण पुस्तक है और हम सबको पढ़नी चाहिए। अगर आपको अंधेरे से बाहर निकलना है, आप रोशनी की तलाश में हैं, तो यह पुस्तक टॉर्च की तरह, रोशनी की तरह, सूरज की किरण की तरह काम करेगी।
सुदर्शन आयंगर ने कहा कि इला भट्ट ने गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांतों पर चलते हुए महिलाओं को सशक्त बनाने का कार्य किया। प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती रेनाना झाबवाला ने भी अपने वक्तव्य में इला भट्ट के साथ अपने अनुभव साझा करते हुए महिलाओं के संगठित श्रम और सामाजिक न्याय की दिशा में उनके योगदान को रेखांकित किया। पुस्तक की अनुवादक सुश्री नीलम गुप्ता ने अपने विचार रखते हुए कहा कि यह पुस्तक इला भट्ट के लेखों का संग्रह नहीं है, बल्कि उनके भाषणों का संकलन है। इसमें इला भट्ट के 27 भाषण संकलित हैं। उन्होंने कुछ भाषणों के अंश भी पढ़कर सुनाए। उन्होंने कहा कि इला भट्ट ने ही उन्हें अपनी पुस्तक ‘वीमेन, वर्क एंड पीस’ के हिन्दी अनुवाद की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद उन्होंने इला भट्ट को समर्पित किया। नीलम गुप्ता ने कहा कि अनुवाद करते समय उन्होंने मूल भाव, संवेदना और वैचारिक गहराई को पाठकों तक सहज रूप में पहुंचाने का प्रयास किया है, ताकि अधिकाधिक हिन्दी पाठक इस महत्वपूर्ण विचार-परम्परा से जुड़ सकें।
ग़ौरतलब है कि इला रमेश भट्ट (1933–2022) भारत की प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता, श्रमिक नेता और महिला सशक्तिकरण की अग्रदूत थीं। वे स्व-रोज़गार वाली महिलाओं के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष करती रहीं और असंगठित क्षेत्र की महिलाओं को संगठित शक्ति देने का ऐतिहासिक कार्य किया। उन्होंने 1972 में ‘सेल्फ एम्प्लॉयड वीमेंस एसोसिएशन’ यानी ‘सेवा’ (Self-Employed Women’s Association- SEWA) की स्थापना की थी। ‘सेवा’ का उद्देश्य था— असंगठित क्षेत्र की कामकाजी महिलाओं को संगठित करना, उन्हें श्रमिक अधिकार दिलाना और वित्तीय आत्मनिर्भरता के साधन उपलब्ध कराना। इस संगठन से आज लाखों महिलाएं जुड़ी हुई हैं और यह विश्व स्तर पर महिला सहकारी आंदोलन का एक सफल मॉडल माना जाता है।
कार्यक्रम में विद्वानों, शोधार्थियों, पत्रकारों तथा साहित्य और समाज के विविध क्षेत्रों से जुड़े गणमान्य जनों की गरिमामयी उपस्थिति रही। कार्यक्रम के अंत में प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने अतिथियों एवं आगंतुकों के प्रति आभार भी प्रकट किया। यह आयोजन न केवल एक पुस्तक लोकार्पण का अवसर रहा, बल्कि महिलाओं की भूमिका, श्रम की गरिमा और सामाजिक समरसता जैसे विषयों पर सार्थक संवाद का मंच भी सिद्ध हुआ।
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