प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने भारतीय ज्ञान परम्परा की निरंतरता, उसकी वैश्विक प्रासंगिकता तथा वर्तमान संदर्भों में उसके महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने यक्ष-युधिष्ठिर संवाद, यम-नचिकेता संवाद और गीता में कृष्ण-अर्जुन संवाद का उद्धरण देते हुए कहा कि प्रश्न करना आदिकाल से भारत की परम्परा रही है। उन्होंने कहा कि भारत में कोई भी ज्ञान अंतिम नहीं है।
समरसता पर अपने विचार प्रकट करते हुए उन्होंने कहा कि सबको साथ में लेकर चलने का भाव भारतीय परम्परा के मूल में है। परम्परा मूल रूप से भेदभाव रहित है, वह समावेशी है। इस पृथ्वी पर रहने वाले सभी मेरे अपने है, ये भारत का विचार है। संस्कृत के सारे नाटक इस भरत वाक्य से भरे हैं कि सबका कल्याण हो।
ज्ञान क्या है, इस पर बात करते हुए उन्होंने श्वेतकेतु का उदाहरण दिया। जब वह गुरुकुल से पढ़ कर लौटा, तो उसने अपने पिता से कहा कि जो पूछना है, आप मुझ से पूछ सकते हो। मैं सब जानता हूं। पिता ने कहा कि तुमने गुरुकुल में कुछ भी नहीं सीखा और कहा कि तुम पुनः गुरुकुल वापस जाओ। इस संदर्भ में उन्होंने बताया, ‘केनोपनिषद्’ का ऋषि कहता है – जो यह जानता है कि वह जानता है, वह नहीं जानता। जो यह जानता है कि वह नहीं जानता, वह जानता है।
गीता लोकतंत्र का सार है- रामबहादुर राय
रामबहादुर राय ने कहा कि गीता में लोकतंत्र है। आप पूरी गीता पढ़ जाएं, लेकिन आपको कहीं पर भी यह नहीं मिलेगा कि कृष्ण ने अर्जुन से कभी कहा हो कि तुम बुद्धुओं जैसे प्रश्न प्रश्न क्यों कर रहे हो, बल्कि कृष्ण ने अर्जुन को प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित किया, प्रश्न आमंत्रित किए। गीता लोकतंत्र का सार है। उन्होंने यह भी कहा कि समाज की तरह भारतीय ज्ञान परम्परा के भी नारा बनकर रह जाने का खतरा हो सकता है। ये एक लंबी साधना है। प्रो. देवेंद्र स्वरूप की डायरियों पर आधारित ‘भारत की ज्ञान यात्रा’ पुस्तक के तीनों खंड इस साधना में बहुत सहायक सिद्ध होंगे।
कार्यक्रम के प्रारंभ में, आईजीएनसीए के डीन एवं कलानिधि विभाग के प्रमुख प्रो. (डॉ.) रमेश चन्द्र गौड़ ने स्वागत एवं परिचय प्रस्तुत करते हुए व्याख्यान की पृष्ठभूमि और उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रो. देवेंद्र स्वरूप का चिंतन भारतीय बौद्धिक परम्परा को समझने और उसे समकालीन विमर्श से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है।
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