अमेरिका की ग्रीन कार्ड रोक से भारतीय IT सेक्टर में बढ़ी अनिश्चितता, कर्मचारियों के भविष्य पर सवाल

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन की ओर से आठ प्रमुख टेक्नोलॉजी कंपनियों की रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर रोक लगाने के फैसले ने भारतीय IT उद्योग और अमेरिका में काम कर रहे पेशेवरों के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है। प्रभावित कंपनियों में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), इंफोसिस, विप्रो और एचसीएलटेक जैसी भारतीय IT कंपनियों के साथ माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी भी शामिल हैं। हालांकि, इस कार्रवाई का मतलब सभी भारतीय IT कर्मचारियों के वीजा या ग्रीन कार्ड रद्द होना नहीं है। इसका सीधा असर रोजगार-आधारित स्थायी निवास की प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण चरण पर पड़ा है।

Written By : Ramnath Rajesh | Updated on: October 9, 2026 11:21 pm

अमेरिकी श्रम विभाग की कार्रवाई का केंद्र PERM (Program Electronic Review Management) प्रक्रिया है। इसके तहत नियोक्ता को यह प्रमाणित करना होता है कि संबंधित पद पर विदेशी कर्मचारी की नियुक्ति से योग्य अमेरिकी कर्मचारियों के रोजगार के अवसरों और वेतन पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। इस प्रक्रिया के बाद पात्र कर्मचारी रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड के लिए आगे बढ़ सकते हैं। आठ कंपनियों से जुड़ी नई और लंबित अर्जियों पर कार्रवाई रोकने से उन कर्मचारियों की स्थायी निवास की योजना प्रभावित हो सकती है, जिनकी प्रक्रिया संबंधित नियोक्ता पर निर्भर है।

अमेरिकी प्रशासन के आरोप, कंपनियों का अपना पक्ष

अमेरिकी प्रशासन ने आरोप लगाया है कि कुछ कंपनियां विदेशी कर्मचारियों की भर्ती के लिए उपलब्ध व्यवस्थाओं का इस्तेमाल इस तरह कर रही हैं, जिससे अमेरिकी कर्मचारियों के रोजगार और वेतन पर असर पड़ सकता है। प्रशासन की कार्रवाई इसी चिंता के संदर्भ में सामने आई है। हालांकि, कंपनियों पर लगाए गए आरोपों को अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता।

दूसरी ओर, माइक्रोसॉफ्ट ने अपने वीजा कार्यक्रम के इस्तेमाल का बचाव किया है। कंपनी के अनुसार, पिछले वित्त वर्ष में उसके करीब 6,000 H-1B आवेदनों में लगभग 80 प्रतिशत मौजूदा कर्मचारियों के स्टेटस में विस्तार या बदलाव से जुड़े थे, न कि नए कर्मचारियों की भर्ती से। यह कंपनी का अपना पक्ष है, जो अमेरिकी प्रशासन के आरोपों के बीच रोजगार और वीजा प्रक्रिया की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

तत्काल कारोबारी असर सीमित, लेकिन लंबी अवधि की चिंता

भारतीय IT उद्योग के लिए इस फैसले का तत्काल आर्थिक प्रभाव कितना होगा, इसे लेकर तस्वीर अभी स्पष्ट नहीं है। TCS ने संकेत दिया है कि पिछले दो वर्षों में उसकी PERM अर्जियों की संख्या एकल अंक में रही है और उसे अपनी कार्यबल रणनीति या ग्राहकों को सेवाएं देने पर बड़े प्रभाव की आशंका नहीं है। उद्योग संगठन Nasscom ने भी बताया है कि भारतीय IT कंपनियां पिछले कुछ वर्षों में H-1B वीजा पर निर्भरता कम करते हुए अमेरिका में स्थानीय स्तर पर नियुक्तियां बढ़ा रही हैं।

इन तथ्यों से संकेत मिलता है कि इस कार्रवाई का तत्काल प्रभाव कंपनियों के पूरे कारोबार पर व्यापक संकट के रूप में दिखाई देना जरूरी नहीं है। लेकिन लंबी अवधि में कर्मचारियों को बनाए रखने, अनुभवी पेशेवरों की भर्ती, कानूनी प्रक्रियाओं की लागत और अमेरिका में प्रतिभा प्रबंधन की रणनीति पर असर पड़ सकता है। जिन कर्मचारियों की स्थायी निवास प्रक्रिया लंबित है, उनके लिए अनिश्चितता का सवाल विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

H-1B वीजा और ग्रीन कार्ड में अंतर समझना जरूरी

इस फैसले को लेकर सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि PERM प्रक्रिया पर रोक लगने का अर्थ H-1B वीजा का स्वतः रद्द होना नहीं है। H-1B अस्थायी रोजगार से जुड़ा वीजा है, जबकि ग्रीन कार्ड अमेरिका में स्थायी निवास का रास्ता प्रदान करता है। दोनों की कानूनी प्रक्रियाएं अलग हैं।

इसलिए कार्रवाई से प्रभावित कंपनियों के सभी कर्मचारियों को नौकरी छोड़ने या अमेरिका से लौटने की स्थिति में मान लेना सही नहीं होगा। वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कर्मचारी किस वीजा श्रेणी में है, उसकी PERM प्रक्रिया किस चरण में है और उस पर लागू अन्य आव्रजन नियम क्या हैं। हालांकि, लंबे समय तक स्थायी निवास का रास्ता बाधित रहने से कर्मचारियों की नौकरी, परिवार और भविष्य की योजनाओं को लेकर अनिश्चितता बढ़ सकती है।

भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों के लिए भी अहम

भारत सरकार ने भारतीय पेशेवरों के अमेरिकी अर्थव्यवस्था और नवाचार में योगदान को रेखांकित करते हुए इस तरह के कदम पर चिंता जताई है। भारतीय IT कंपनियों के लिए अमेरिका प्रमुख बाजारों में शामिल है। ऐसे में आव्रजन नियमों में बदलाव केवल कर्मचारियों के व्यक्तिगत भविष्य का मामला नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच तकनीकी सेवाओं, प्रतिभा की आवाजाही और कारोबारी संबंधों से भी जुड़ा है।

भारतीय IT उद्योग के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे अमेरिकी ग्राहकों को प्रतिस्पर्धी और गुणवत्तापूर्ण सेवाएं देते रहना है, वहीं दूसरी ओर बदलती आव्रजन नीतियों के अनुरूप भर्ती और प्रतिभा प्रबंधन की रणनीति बनानी है। भारत से अधिक काम संचालित करना, अमेरिकी बाजार में स्थानीय नियुक्तियों को बढ़ाना और अन्य बाजारों में कारोबार का विस्तार करना कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण विकल्प हो सकते हैं।

फिलहाल, आठ कंपनियों से जुड़ी PERM प्रक्रिया पर रोक को भारतीय IT उद्योग के तत्काल कारोबारी संकट के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। लेकिन इस फैसले ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि अमेरिकी आव्रजन नीति में बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारतीय पेशेवरों के स्थायी निवास का रास्ता कितना सुगम रहेगा और कंपनियां भविष्य में अपनी वैश्विक कार्यबल रणनीति किस तरह बदलेंगी।

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