ईश्वरीय प्रेम में प्रयासरत जीवन ही सार्थक

अज्ञानी मनुष्य जितना प्रयत्न धनवान, पुत्रवान और प्रतिष्ठावान बनने के लिए करते हैं, उतना ही प्रयत्न भगवान की भक्ति और ज्ञान के लिए नहीं करते। परम सुख के साधन की उपेक्षा करके वे दुखों को ही बढ़ाते हैं। किसी भी संसारी वस्तु से कोई कभी सुखी नहीं हो सकते।

Written By : मृदुला दुबे | Updated on: January 6, 2026 11:29 pm

इस नश्वर संसार की वस्तुओं से सुख पाने की इच्छा उसी प्रकार है जैसे कि वन्ध्या के पुत्र के विवाह की तैयारी हो। जबकि पुत्र ही नहीं है, तो फिर विवाह किसका होगा। स्त्री, धन, पुत्र आदि संसारी वस्तुओं में जरा भी स्थाई सुख नहीं है। यही सत्य है इसलिए उनसे सुख मिलने वाले सुख की कल्पना करना ही व्यर्थ है। अज्ञान के कारण ही अपना अनर्थ में लिप्त हो जाते हैं। वही जीवन सार्थक है जो ईश्वरीय प्रेम में प्रयासरत है। केवल सुबह शाम पेट भरना ही जीवन का दुरुपयोग है। भगवान के दर्शन के लिए ही जीना चाहिए़ और साधन भी करते रहना चाहिए।

किसी भी बीज को सेंक देने से उसमें कभी अंकुर नहीं निकलता। ठीक वैसे ही मनुष्य का मन भी ज्ञान और भक्ति की गरमी से तप जाता है । तभी उसमें से जन्म-मरण का अंकुर समाप्त हो जाता है। भक्ति और ज्ञान प्राप्ति का प्रयत्न करो। किन्तु ऐसा ज्ञान न लो कि संसार से आसक्ति बनी रहे हम केवल वाणी से ही ‘शिवोऽहम्’, शिवोहम,‘अहं ब्रह्मास्मि’ आदि कहते रहें। कोरे ज्ञान से कोई लाभ नहीं होता बल्कि हानि होती है।

संसारी वस्तुओं से प्रेम न छूटने तक ब्रह्म-चर्चा में उलझने की जगह भगवान की भक्ति करनी चाहिए। ज्ञान और वैराग्य आने से भगवान में गहरा प्रेम हो जाता है और तब जन्म-मरण का बंधन भी छूट जाता है। मनुष्य की हर बात बात वेद-शास्त्रों के अनुकूल हो। अपने विचार से कोई भी बात बहुत अच्छी बुरी नहीं होती। वेद-शास्त्र जिस आचरण को अच्छा कहते हैं। वही आचरण अच्छा है और जिसे बुरा कहते हैं वो बुरा है। साथ जाने वाले धन का संग्रह करो । यहीं छूट जाने वाला धन संग्रह व्यर्थ है। अस्थायी धन के संग्रह से कुछ भी लाभ नहीं है।

“धनाशा जीविताशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यते।”
अर्थात शरीर के जर्जर हो जाने पर भी धन और जीवन की आशा नहीं जाती।

एक वृद्धा लकड़ी बीनकर जीवन यापन करती थी। लोभवश उसने लकड़ियों का बहुत बड़ा गट्ठर बाँध लिया, जिसे वह उठा नहीं सकी। थक-हारकर उसने कहा, “यदि मृत्यु आ जाए तो इस कष्ट से छुटकारा मिले।” तभी मृत्यु प्रकट हुई। वृद्धा ने मृत्यु से कहा, “इस गट्ठर को उठाने के लिए बुलाया था।”
तात्पर्य यह है कि मनुष्य मरना नहीं चाहता भले ही उसकी स्थिति कितनी भी दुखदाई हो। केवल खाने-पीने, मौज मस्ती और विषय-भोग में बिताने वाला जीवन व्यर्थ है। सार्थकता इसी में है कि आगे के लिए हम कुछ अच्छा निर्माण करें।

सदैव स्मरण रखना चाहिए कि यदि किसी की भलाई न कर सको, तो बुराई भी नहीं करनी चाहिए़। परम पिता परमात्मा का चिंतन ,भजन-पूजन करते रहें। हमारा मन लगे या न लगे फिर भी अभ्यास करते रहो। निरंतर अभ्यास करते रहने से मन लगने लगता है।

अपने कीमती जीवन के चरम लक्ष्य को किसी अनुभवी गुरु मार्गनिर्देशन में पूर्ण करो। अपने जीवन की प्रवृत्ति ऐसी होनी चाहिए जो कि लक्ष्य-प्राप्ति में सहायक बने। शास्त्रानुसार व्यवहार ही हमारे परमार्थ का साधन बनेगा।

निरंतर सत्संग से उचित-अनुचित, पाप-पुण्य, धर्म और अधर्म का विवेक जागृत होता है। अच्छे संग में रहने वाले ही अधर्म से बचते है और धार्मिक बनते हैं। सत्संग से दुख और क्रोध का नाश होता है। ईश्वर की ओर बढ़ने वाले के लिए किसी भी चीज की कमी नहीं रहती।
इसीलिय कहा है –

“बिनु गुरु होइ कि ज्ञान, ज्ञान कि होइ बिराग बिनु।
हरि भगति बिनु सुख कहँ, गावहिं वेद पुरान बिनु॥

गुरु के बिना ज्ञान नहीं होता, वैराग्य के बिना ज्ञान नहीं मिलता और हरि-भक्ति के बिना कोई सुख नहीं मिलता।

रामानुजाचार्य की शिक्षाएं

इस धरती पर जीव के कल्याण हेतु भगवान ने अपनी शक्ति से चैतन्य महाप्रभु के युग-अवतार की पृष्ठभूमि तैयार की। पहले ईश्वर बुद्ध के रूप में प्रकट हुए। भगवान शिव के रूप में वेदों के स्थापना की। तत्पश्चात लक्ष्मण का अवतार कहे जाने वाले रामानुजाचार्य प्रकट हुए, जिन्होंने वेदों का वास्तविक सार—शुद्ध भक्ति—स्थापित की।

किसी भी सिद्धांत को मानने के लिए रामानुजाचार्य ने कहा कि एकमात्र प्रमाण शास्त्र हैं। उन्होंने वेदांत और उपनिषदों के सूत्रों के माध्यम से भगवान नारायण को परम सत्य के रूप में स्थापित किया। श्रीभाष्य में उन्होंने बताया कि जीव, जगत और ईश्वर आदि सब परम सत्य से उत्पन्न हैं। इसलिए कुछ भी भ्रम नहीं हैं। उन्होंने विशिष्टाद्वैत दर्शन की स्थापना की।

रामानुजाचार्य ने वैष्णव भक्ति को एक दृढ़ दार्शनिक आधार दिया और अद्वैतवाद को खंडित कर दिया। उन्हीं की शिक्षाओं को माधवाचार्य ने विस्तार दिया। चैतन्य महाप्रभु ने ईश्वर और जीव का समन्वय करके अचिंत्य भेदा भेद-तत्व को प्रकट किया।आचार्य रामानुज ने सिद्ध किया कि जीव, जगत और ईश्वर तीनों आर्य सत्य हैं और भक्ति ही मोक्ष का मार्ग है।

(मृदुला दुबे योग शिक्षक एवं अध्यात्म की जानकर हैं।)

ये भी पढ़ें :-राजा जनक अनाशक्त जीवन के आदर्श उदाहरण

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *