इसे संज्ञेय अपराध बताते हुए पीड़ित ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के निदेशक को उनके पोर्टल पर और ईमेल से लिखित शिकायत दर्ज करायी है तथा निर्देशानुसार ब्यूरो के पटना कार्यालय के प्रमुख प्रांजल रुंगला के समक्ष उपस्थित होकर, उनके प्रश्नों का उत्तर भी दिया है। पीड़ित अधिवक्ता ने ब्यूरो से जाँच के लिए आदेश निर्गत करने हेतु, भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और कार्मिक विभाग, भारत सरकार से भी आग्रह किया है, जिसकी पंजीयन संख्या- पी एम ओ जी / ई / 2026 / 0101620 है।
हिन्दी-प्रेमी अधिवक्तागण एवं अनेक हिन्दी संस्थाएँ, पीड़ित अधिवक्ता के पक्ष में खड़ी हुई हैं तथा संघर्षरत एक अधिवक्ता को भयभीत करने तथा मानसिक-आर्थिक आघात पहुँचाने के इस कुचक्र की निन्दा की हैं। इन संस्थाओं ने सरकार से आग्रह किया है कि वह अपेक्षित और समुचित हस्तक्षेप करे तथा पीड़ित अधिवक्ता को न्याय प्रदान करे। उनका मत है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी इस विषय का संज्ञान लेना चाहिए, क्योंकि यह विषय न्याय देने और दिलाने वाली संस्थाओं पर भी प्रश्न चिन्ह लगाता है। यह इसलिए भी आवश्यक है कि आम भारतीय जनता को जिस न्यायपालिका पर भरोसा है, उस पर अविश्वास उत्पन्न न हो।

अधिवक्ता इंद्रदेव प्रसाद
हस्तक्षेप का आग्रह करने वालों में, अखिल भारतीय अधिवक्ता कल्याण समिति के अध्यक्ष और वरीय अधिवक्ता धर्मनाथ प्रसाद यादव, वैश्विक हिन्दी सम्मेलन, मुंबई के निदेशक डा मोतीलाल गुप्ता, अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन, दिल्ली के अध्यक्ष डा हरपाल सिंह राणा, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डा अनिल सुलभ, हिन्दी सेवा निधि, इटावा के महासचिव और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप कुमार, हिन्दी शिक्षा संघ, ऑस्ट्रेलिया के अधिकारी सुभाष शर्मा, वरिष्ठ अधिवक्ता डा उमा शंकर सिंह, भारतीय भाषा अभियान के राष्ट्रीय संरक्षक अशोक मेहता, शिक्षा नीति न्यास के सचिव अतुल भाई कोठारी, विद्वान अधिवक्ता डा अजीत कुमार, उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता उमेश शर्मा के नाम सम्मिलित हैं।
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