अहिल्याबाई की 300वीं जयंती के उपलक्ष्य में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) और लोकमाता अहिल्याबाई त्रिशताब्दी समारोह समिति ने एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया। महान परोपकारी और प्रख्यात शासिका लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर के जीवन, कार्य और योगदान को रेखांकित करने वाले इस व्याख्यान का विषय था- ‘देवी अहिल्या – सम्राजी संन्यासिनी” और मुख्य वक्ता थीं कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय, रामटेक, नागपुर की पूर्व कुलपति प्रोफेसर उमा वैद्य।
कार्यक्रम की अध्यक्षता राज्यसभा की पूर्व सांसद और आईजीएनसीए की ट्रस्टी पद्मविभूषण डॉ. सोनल मानसिंह ने की। इस अवसर पर आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला की अध्यक्ष प्रो. शशिप्रभा कुमार की भी गरिमामय उपस्थिति रही। आईजीएनसीए के कला दर्शन प्रभाग की अध्यक्ष प्रो. ऋचा काम्बोज भी इस अवसर पर उपस्थित रहीं।
प्रो. उमा वैद्य ने लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं प्रशासनिक योगदान पर गहन चर्चा की। उन्होंने व्याख्यान के चार शब्दों- देवी, अहिल्या, सम्राज्ञी और संन्यासिनी की व्याख्या करते हुए अहिल्याबाई होलकर के 70 वर्षों के जीवन और कार्यों को विस्तार और गहनता से श्रोताओं के समक्ष रखा। उन्होंने कहा कि देवी अहल्या को कुछ लोग अहल्या कहते हैं और कुछ लोग अहिल्या। इन दोनों नामों की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि विवाह के पहले वह अहल्या थीं और विवाह के बाद अहिल्या हो गईं। उन्होंने कहा, “देवी अहिल्याबाई होल्कर ईश्वर की कृति का एक उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ‘अहल्या’ का अर्थ है ‘वह भूमि जिस पर हल नहीं चला यानी जिस पर जुताई नहीं होती है’।
यह पवित्रता का प्रतीक है। वहीं अहिल्या का अर्थ होता है, जिसे हिलाया नहीं जा सकता, जो दृढ़ है, अटल है। यह नाम शक्ति और सहनशीलता को दर्शाता है। यह देवी अहिल्याबाई के व्यक्तित्व में गूंजता है, उनके अडिग संकल्प और नैतिक नेतृत्व को प्रतिबिंबित करता है। अपने जीवन और कार्यों के माध्यम से उन्होंने उन गुणों का प्रदर्शन किया, जिनका प्रतीक उनका नाम है। उन्होंने करुणा और निष्ठा की एक अमिट विरासत छोड़ी। भारतीय परंपरा में ‘देवी’ शब्द का अर्थ केवल एक ‘तेजस्विनी नारी’ नहीं है, बल्कि यह दिव्यता का भी प्रतीक है। अहिल्याबाई का नेतृत्व इस दिव्य तत्व को प्रदर्शित करता है। उन्होंने एक मां के समान अपनी प्रजा की देखभाल की, जिसके कारण उन्हें ‘लोकमाता’ की उपाधि मिली। अहिल्याबाई का व्यक्तित्व दुर्लभ और प्रेरणादायक है, विशेषकर उस युग में, जब देश पर विदेशी शासन था।
उनका योगदान आर्थिक, राजनीतिक, कूटनीतिक और सैन्य क्षेत्रों में फैला हुआ था और जो परोपकारिता तथा लोगों की सेवा की प्रतिबद्धता से परिपूर्ण था। अहिल्याबाई वास्तव में ‘सम्राजी संन्यासिनी’ की उपाधि की पात्र हैं। वे एक ऐसी नेता थीं, जिन्होंने निस्वार्थ भाव से अपनी प्रजा के कल्याण के लिए सत्ता का उपयोग किया। वे मूल्यों, चरित्र और त्याग की भावना का प्रतीक हैं। उन्होंने इतिहास में ऐसी अमिट छाप छोड़ी, जो कालातीत है।”
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. सोनल मानसिंह ने अहिल्याबाई के जीवन की कुछ घटनाओं का उल्लेख करते हुए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जब पेशवा राघोबा ने इंदौर पर आक्रमण करने की मंशा बनाई, तब देवी अहिल्याबाई ने जिस साहस, सूझबूझ और रणनीति का उदाहरण प्रस्तुत किया, वह हम सबके लिए प्रेरणा का स्रोत है। वहीं प्रो. शशिप्रभा कुमार ने इस कार्यक्रम का परिचय प्रस्तुत किया और बाद में, प्रो. उमा वैद्य के वक्तव्य का सारांश श्रोताओं के समक्ष रखा।
डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा, “ये हमारे लिए गर्व का विषय है कि पूरा देश पुण्यश्लोका अहिल्याबाई की त्रिशताब्दी मना रहा है। उनके जो 300 हुए हैं, उसका स्मरण करना हमारी सामाजिक प्रतिबद्धता और हमारे देश के अंदर रची-बसी आध्यात्मिकता को याद करना है। हम सब जानते हैं कि अहिल्याबाई होल्कर ने अपने जीवन में जिस तरह के कार्य जितनी जटिल चुनौतियों के बीच किए हैं, वो किसी भी व्यक्ति के लिए प्रेरणा का स्रोत हो सकते हैं।” कार्यक्रम के अंत में, प्रो. ऋचा काम्बोज ने वक्ताओं, अतिथियों और आगंतुकों के प्रति आभार प्रकट किया।
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