किताब का हिसाब : अलग स्वाद का उपन्यास है अलका सरावगी का ‘गाँधी और सरलादेवी चौधरानी : बारह अध्याय’

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन यूँ तो लगभग सौ साल का माना जाता है पर अगर वृहत रूप में विचार करें तो यह पंद्रह सौ साल का सुषुप्त आंदोलन था जब दुनिया के अलग अलग क्षेत्र से लोग भारत को 'लूटने','खसोटने',शासन करने आते रहे. हाँ व्यवस्थित रूप से सौ साल का संघर्ष माना जा सकता है. भारत का इतिहास एक साम्राज्यवादियों का इतिहास है इसमें अब बहुत जगह खोट दिखाई देने लगा है पर आज चर्चा उन बातों की जो इतिहास में दर्ज नहीं है.

Written By : प्रमोद कुमार झा | Updated on: November 5, 2024 2:17 pm

Alka Saraogi

सौ वर्ष की बहुत सारी घटनाएं, कहानियां उस समय की परिस्थिति और व्यक्तित्व के परिचय में सहायक होती है तत्कालीन या बाद में लिखे गए साहित्यिक कृतियों में .ये साहित्यिक कृतियाँ उस समय के ख्यातिप्राप्त लोगों के व्यक्तित्व को जानने और तत्कालीन माहौल को समझने में सार्थक सिद्ध होती हैं.

हाल में हिंदी की प्रतिष्ठित, सम्मानित, बहुपठित लेखिका अलका सरावगी (Alka Saraogi) के उपन्यास “गाँधी और सरलादेवी चौधरानी: बारह अध्याय” पर नज़र पड़ी. अलका जी की कथ्यात्मक शैली तो अपने आप में विरल है. इस उपन्यास के बारे में प्रसिद्ध इतिहासकार और गांधी विशेषज्ञ सुधीर चंद्रा जी लिखते हैं “ब्रह्मचर्य का व्रत ले चुके महामानव गांधी और असाधारण सौंदर्य और प्रतिभा की धनी सरलादेवी चौधरानी के बीच पनपे झंझावाती आकर्षण का जैसा बारीक, मार्मिक और संयत वर्णन यहां हुआ है कहीं और नहीं मिलेगा .”

अलका सरावगी जी ने गांधी के महामानव रूप को तो दर्शाया है पर उन्हें एक साधारण मानवोचित भावनाओं से मुक्त नहीं माना है .यही तो इनके लेखन की विशेषता है. सरलादेवी चौधरानी के रूप और व्यक्तित्व का वर्णन भी अपने आप में एक उदाहरण ही है. कितनी मर्यादा के संग कितनी गंभीर विषय को रोचक ढंग से लिखा जा सकता है यह कोई अलका जी के इस उपन्यास को पढ़कर समझे.

एक और बात बहुत गंभीरता से समझ में आती है कि किसी पुराने प्रसंग को लेकर उपन्यास लिखने में कितने गहन अनुसंधान और शोध की आवश्यकता है. अलका जी को इस में महारत हासिल है. “सरलादेवी अंदर से एकदम खाली हो गयी हैं मानो उनके अंदर दिल-जिगर-गुर्दा न होकर हवा भर गयी है.चलती है तो लगता है, हवा में तैर रही है.खाने बैठती हैं तो गले में जैसे कुछ अटक जाता है…………..

रामभज देख रहे हैं कि सरला की हर बात में गाँधी का जिक्र होता है. खाने की बात हो तो गांधी का फलाहार, कपड़ों की बात हो तो गाँधी का चरखा. एक सप्ताह के बाद एक बार उन्होंने टोक दिया-‘लगता है,तुम गाँधी का तोता बन गयी हो. उनकी हर बात दोहराती रहती हो.’ सरला चौंक गयी थी……” (अध्याय 6,पृष्ठ 81)

216 पृष्ठ का यह उपन्यास एक अलग स्वाद का रोचक उपन्यास है जिसमें तत्कालीन समृद्ध समाज की एक युवा स्त्री सरलादेवी चौधरानी के बहुआयामी व्यक्तित्व की झलक भी मिलती है. उपन्यास पठनीय, विचारणीय और संग्रहणीय है.

प्रकाशक:वाणी प्रकाशन

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)

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2 thoughts on “किताब का हिसाब : अलग स्वाद का उपन्यास है अलका सरावगी का ‘गाँधी और सरलादेवी चौधरानी : बारह अध्याय’

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