प्रेम ने अपनी लेखनी में काफी प्रयोग किये हैं .अलग अलग विषयों को ध्यान में रखकर प्रेम कविताएं लिखते रहते हैं और फिर कविताओं के जमा हो जाने पर उसे संग्रह का रूप दे देते हैं. प्रेम की सारी कविताएं किसी त्वरित प्रक्रिया के अंतर्गत नहीं लिखी जाती हैं. इसलिए उनकी कविता में एक प्रवाह है ,’आर्गेनिक ‘ विकास है उनके भावों और शब्दों का उनकी कविताओं में. प्रेम ने माँ को केन्दित कर कविता का एक संग्रह प्रकाशित किया है. एक भावुक, संवेदनशील कवि प्रेम की रचनाओं में स्त्री एक श्रेष्ठ स्थान रखती हैं. प्रेम की भाषा बिल्कुल जटिल नहीं होती, नदी की धारा की तरह प्रवाहमान होती है. पाठकों को भाषा , उपमाओं और छंदों के बीहड़ में अटकना नहीं पड़ता क्योंकि इनकी उपमाएं भी समकालीन जीवन से ही ली गयी हैं. पाठकों को कविताओं के साथ बहने, तैरने में आनंद आएगा.
कहीं प्रसिद्ध कवि पाब्लो नेरुदा ने लिखा है : ‘कविता उनकी नहीं होती/जो उसे लिखते हैं/ बल्कि उनकी होती है /जिनको उनकी जरूरत होती है’ प्रेम के कविता की भी ज़रूरत है. बहुत सरलता से जीवन की जटिलताओं को खेल की विभिन्न उपमाओं का माध्यम से अपनी कविताओं में रखा है प्रेम ने. संग्रह का नाम है “,जीवन खेल” .मुख पृष्ठ पर ही नीचे लिखा है ‘खेल के बहाने जीवन की कविताएं ‘ संग्रह के प्रारंभ में कवि लिखता है : “खेल खेल में /जीवन कितना/जीवन में भी कितना खेल’ कवि प्रेम रंजन अनिमेष ने संग्रह को समर्पित किया है ‘खेल को जीवन और जीवन को मान देने वाले जाने माने और अजाने सभी सच्चे खिलाड़ियों के नाम और देश के लिए विश्वमंच पर सर्वाधिक सफलताएं अर्जित करनेवाले हॉकी दल 1983, 85, 007, 2011, 2013, 2024, 2025 की विश्वविजेता भारतीय क्रिकेट टीम, 2022 में दुनिया जीतने वाले बैडमिंटन खिलाड़ियों, 2024 में शतरंज ओलिंपियाड जयी भारतीय महिला और पुरुष प्रतिभागियों और आगे जग जीतने वाली देश की विश्वविजयिनियों के लिए ‘ 182 पृष्ठ के इस संग्रह में छोटी- छोटी 92 कविताएं हैं.
यह कविता संग्रह आम कविता संग्रहों से बिल्कुल भिन्न है और भारतीय भाषाओं में खेल पर केंद्रित प्रायः पहला संग्रह होगा. पूरे विश्व में और भारत में भी जीवन शैली, अर्थव्यवस्था,बातचीत में खेलों ने कितना प्रभावित किया है. खेल भावना से जीवन जीने की सुविधा और सहजता की ओर कवि बार बार इशारा करते हैं. कवि प्रेम ने मूलतः क्रिकेट के खेल का और तकनीकी शब्दों का प्रयोग किया है पर कभी कभी कबड्डी की भी चर्चा आती है. खेल और जीवन के गति की चर्चा लगातार होती रहती है इनकी कविताओं में. प्रायः भारत में खेले जाने वाले अन्य खेल के शब्दावलियों का भी प्रयोग हुआ होता तो फलक और भी विस्तृत होता. यूं बातचीत में भी कहते हैं कि जीवन खेल भावना से जीयो, क्योंकि इसमें कोई अंतिम हार और जीत नहीं होती है.
देखिये कविता ‘टोक’ की कुछ पंक्तियाँ: “आंखों देखा हाल सुना रहे/विशेषज्ञ टीकाकार/ जब बांध रहे होते/पुल सराहना के/एक गेंद आकर/उड़ा देती गिल्ली/बिखर जाते डंडे/ शायद इसे ही कहते/आलोचक का/अभिशाप” आइए देखते हैं “घर- बाहर” कविता के कुछ पंक्तियों को .. “…..बाहर निकल सकते हो/मुकाबले के लिए/हमलों को नाकाम करने/कुछ जोड़ने अरजने/ हासिल करने के वास्ते/ मगर सही समय / लौट आना भी है/ कि तुम्हारे पीछे/घर तुम्हारा/न बिखेर दे कोई/जड़ें न हिला दे/भागे भागे आओगे/दरवाज़े तक/दहलीज़ पर /पाँव टिकाओगे।/फिर भी हार जाओगे/मारे जाओगे /याद रहे/दर तक पहुंचना/ घर पहुँचना नहीं है.” संग्रह की सारी कविताएं रोचक, अति पठनीय हैं. संग्रह संग्रहणीय है. पुस्तक की छपाई साफ और सुंदर है.
कृति: जीवन खेल, कवि : प्रेम रंजन अनिमेष , प्रकाशक: प्रभाकर प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष: 2025 पृष्ठ: 184, मूल्य:रु 250.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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विस्तृत और गहन समीक्षा। कवि और समीक्षक को ढ़ेरों बधाई।
वाहह७ बहुत सुंदर सार्थक समीक्षा सर
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