देशरत्न डा राजेंद्र प्रसाद बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के संस्थापकों में से प्रमुख तो थे ही, सम्मेलन के अध्यक्ष भी रहे और गौरव की बात यह है कि वे सम्मेलन के एक नियुक्त ‘हिन्दी-प्रचारक’ भी थे। दक्षिण-भारत के अनेक प्रांतों में उन्होंने हिन्दी का प्रचार किया। ‘हिन्दी-सेवा’ उनके लिए ‘राष्ट्र-सेवा’ थी। यह बातें देशरत्न की जयंती पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित समारोह की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी के बाद देशरत्न ही भारत के प्रतिनिधि नेता थे। २०वीं सदी में उनके जैसी मेधा का दूसरा कोई व्यक्ति नहीं हुआ। इसीलिए उनकी जयंती को हम ‘राष्ट्रीय मेधा-दिवस’ घोषित करने की मांग बरसों से करते आ रहे हैं। भारत सरकार को इसकी अधिसूचना शीघ्र निर्गत करनी चाहिए।
जयंती पर बहुभाषाविद् विदुषी डा मिथिलेश कुमारी मिश्र को स्मरण करते हुए डा सुलभ ने कहा कि मिथिलेश जी भाषा के स्तर पर उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने वाली एक दिव्य-सेतु थीं। उन्हें संस्कृत के साथ तमिल, तेलगू, कन्नड़ आदि अनेक दक्षिण भारतीय भाषाओं का विशद ज्ञान था। दक्षिण में हिन्दी के प्रचार और प्रसार में उनका अतुल्य योगदान रहा है। दक्षिण भारत में उनकी लोकप्रियता और प्रतिष्ठा उत्तर की तुलना में बहुत अधिक थी। वहाँ उन्होंने अनेक विदुषियों को प्रेरित कर हिन्दी-सेवा में तत्पर किया। आज भी दक्षिण की विदुषियाँ उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करती हैं। यह पीड़ा का विषय है कि युवावस्था में ही उन्हें वैधव्य का दारुण दुःख सहना पड़ा। किंतु साहित्य ने ही उन्हें संभाला और फिर उन्होंने ‘साहित्य-देवता’ को ही अपना पति मानकर जीवन भर उसकी सेवा करती रहीं।
समारोह का उद्घाटन करते हुए, सिक्किम के पूर्व राज्यपाल गंगा प्रसाद जी ने कहा कि राजेन्द्र बाबू अद्भुत मेधा के महापुरुष थे। एक बड़े विधिवेत्ता थे। अपने लिए बहुत कुछ अर्जित कर सकते थे। किंतु गांधी जी की प्रेरणा से देश-सेवा में अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पित कर दिया। उनमे भारतीयता कूटकूट कर भरी हुई थी। राजेन्द्र बाबू का जीवन अनुकरणीय और प्रेरणास्पद है। इस अवसर पर पूर्व राज्यपाल ने युवा कवि राकेश कुमार वर्मा के काव्य-संग्रह ‘संलाप’ का लोकार्पण किया और कवि को अपनी शुभकामनाएँ प्रदान की।
आरंभ में अतिथियों का अभिनन्दन करते हुए, सम्मेलन के ९२ वर्षीय प्रधानमंत्री डा शिववंश पाण्डेय ने देशरत्न को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया और कहा कि राजेन्द्र बाबू को जो सम्मान देश के अन्य प्रांतों ने दिया वह बिहार से नहीं मिला। उनकी जयंती को ‘मेधा-दिवस’ घोषित किया जाना चाहिए। राजेन्द्र बाबू की तरह मिथिलेश जी भी दक्षिण में हिन्दी का बड़ा काम किया। वो बहु-भाषाविद् विदुषी और साहित्य की अनन्य-सेविका थीं।
सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद, डा कल्याणी कुसुम सिंह, डा मधु वर्मा, श्री रघुपति, डा रत्नेश्वर सिंह, वरिष्ठ कवयित्री किरण सिंह, डा पूनम आनन्द, डा ललिता यादव, डा मुकेश कुमार ओझा, डा अशोक प्रियदर्शी, श्रद्धा कुमारी आदि ने अपने विचार व्यक्त किए।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जयंती अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरम्भ चंदा मिश्र की वाणी-वंदना से हुआ। जबलपुर से पधारी वरिष्ठ कवयित्री डा अरुण पाण्डेय, जयपुर से पधारे कवि राव शिवराज पाल सिंह, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, डा पुष्पा जमुआर, कुमार अनुपम, इंदु उपाध्याय, दिनेश्वर लाल दिव्यांशु, मीरा श्रीवास्तव, आनन्द किशोर मिश्र, सुनीता रंजन, इं अशोक कुमार, शंकर शरण आर्य , पं गणेश झा, डा आर प्रवेश, सरिता कुमारी, आदि कवियों और कवयित्रियों ने अपनी काव्यांजलि अर्पित की। मंच का संचालन कवि ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।
वरिष्ठ लेखिका विभारानी श्रीवास्तव, डा पंकज कुमार सिंह, उर्मिला नारायण, नरेन्द्र कुमार पाण्डेय, अविनय काशीनाथ पाण्डेय, डा चंद्र शेखर आज़ाद, प्रीतपाल कौर, अंजु वर्मा, डा चंद्रशेखर आज़ाद, अजीत कुमार भारती आदि प्रबुद्धजन समारोह में उपस्थित थे।
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