कला, संगीत और साहित्य के महान पोषक थे डॉ. जगदीश पाण्डेय

डॉ जगदीश पाण्डेय (Dr. Jagdeesh Pandey) पेशे से अभियन्ता, किन्तु हृदय से लोक-मंगल की भावना रखने वाले कवि (Poet) थे। राज्य सरकार में अपनी सेवा के शीर्ष पद से अवकाश लेने के पश्चात उन्होंने अपना शेष जीवन लोक-कल्याणकारी कार्यों में लगाया। कला(Art), संगीत(Music) और साहित्य(Literature) समेत सभी सारस्वत विधाओं में उनकी गहरी अभिरुचि थी। साहित्य सम्मेलन में जयंती पर किया गया श्रद्धापूर्वक स्मरण, आयोजित हुई लघुकथा-गोष्ठी

Written By : Dhruva Gupta | Updated on: July 16, 2025 11:01 pm

डॉ जगदीश पाण्डेय (Dr. Jagdeesh Pandey) साहित्य और साहित्यकारों के अत्यंत मूल्यवान पोषक थे। उन्होंने अपनी संपदा का, पूरी निष्ठा से, सारस्वत सेवाओं के लिए उपयोग किया। वे अपनी उदारता और सारस्वत सेवाओं के लिए सदैव स्मरण किए जाते रहेंगे। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के संकट के दिनों में वे एक सुदृढ़ ढाल बन कर प्रकट हुए। मृत-प्राय हो चुके सम्मेलन को उन्होंने संजीवनी दी।

हिन्दी भाषा और सम्मेलन का बड़ा उपकार किया डॉ. जगदीश पाण्डेय ने : डॉ.  अनिल सुलभ 

बुधवार की संध्या, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभागार में डा पाण्डेय की जयंती पर आयोजित समारोह और लघुकथा-गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने में यह बातें कही। डा सुलभ ने कहा कि पाण्डेय जी ने सम्मेलन को अत्यंत कठिन-काल से उबारा था। उस समय किसी जगदीश पाण्डेय जैसे उदार और समर्थ व्यक्ति की आवश्यकता थी। सम्मेलन को पटरी पर लाने के लिए उन्हें अनेक प्रकार के व्यय-भार वहन करने पड़े थे। डा पाण्डेय ने भले ही साहित्य की दृष्टि से कोई बड़ी सेवा नहीं की, किंतु सम्मेलन को बचाकर और साहित्यकारों को पोषण देकर उन्होंने हिन्दी भाषा और सम्मेलन का बड़ा उपकार किया। उन्होंने अनेकों असमर्थ साहित्यकारों की पुस्तकें अपने धन से छपवाई और उन्हें संबल दिया।

डा सुलभ ने कहा कि साहित्य, मनुष्यों में ‘मनुष्यता’ भरता है। वह जीवन को मूल्यवान बनाते हुए मनुष्यों के हृदय में औरों के हित का बीज रोपता है। इसलिए यह किसी भी सभ्य-समाज का आधार और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्व है, जिसकी रक्षा कोई भी मूल्य देकर की जानी चाहिए।

लघुकथा लेखन में बिहार का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान : जियालाल आर्य 

वरिष्ठ साहित्यकार एवं सम्मेलन के वरीय उपाध्यक्ष जियालाल आर्य ने कहा कि लघुकथा लेखन में बिहार का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। आचार्य शिवपूजन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी, आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ आदि महान साहित्यिक विभूतियों ने ‘लघुकथा’ को बल प्रदान किया। आधुनिक काल में डा सतीश राज पुष्करणा ने इसे ऊँचाई प्रदान की और इस विधा को लोकप्रिय बनाया।

अतिथियों का स्वागत करते हुए सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद ने कहा कि, जगदीश पाण्डेय जी ने साहित्य सम्मेलन को आड़े वक़्त में संरक्षण देकर तथा साहित्यकारों को विविध प्रकार से सहयोग देकर, हिन्दी की उन्नति में बड़ा ही महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा, डा मनोज गोवर्द्धनपुरी, सुशील साहिल, सोनी सुगंधा, अविनाश बंधु, अरविन्द अंशुमान, चंदा मिश्र आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

आयोजित हुई लघुकथा गोष्ठी

इस अवसर पर आयोजित लघुकथा गोष्ठी में, डा शंकर प्रसाद ने ‘अहसास’, डा पुष्पा जमुआर ने ‘बेवशी’, विभारानी श्रीवास्तव ने ‘आषाढ़ का एक दिन’, कुमार अनुपम ने ‘पर्यावरण दिवस’, मीरा श्रीवास्तव ने ‘मतलब परस्त’, ई अशोक कुमार ने ‘रिश्ते’, अर्जुन प्रसाद सिंह ने ‘फ़ैसला’ तथा इन्दुभूषण सहाय ने ‘रूप एवं गुण’ शीर्षक से अपनी लघुकथा का पाठ किया। मंच का संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।

सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार बाँके बिहारी साव, डा इन्दु पाण्डेय, डा चन्द्रशेखर आज़ाद, सच्चिदानन्द शर्मा, राज कुमार चौबे, दुःख दमन, भास्कर त्रिपाठी, नन्दन कुमार मीत, संजय कुमार मिश्र आदि प्रबुद्धजन समारोह में उपस्थित थे।

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