सच कहें तो मैं वापस आऊंगा फिल्म का शुरुआती लगभग आधा घंटा उतना प्रभावशाली नहीं लगता। कहानी अपने पात्रों और समय-परिस्थिति को स्थापित करने में समय लेती है। कुछ क्षणों में यह आशंका भी होने लगती है कि कहीं फिल्म अपनी महत्वाकांक्षा के बोझ तले दब न जाए। लेकिन जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है, इम्तियाज़ अली दर्शक को अपने भावनात्मक संसार में खींच लेते हैं। एक बिंदु के बाद फिल्म केवल देखी नहीं जाती, महसूस की जाने लगती है।
इम्तियाज़ अली लंबे समय से प्रेम कहानियों के निर्देशक माने जाते रहे हैं, लेकिन इस बार प्रेम उनकी कहानी का अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में से एक—भारत-विभाजन—को समझने का माध्यम बनता है। फिल्म यह बताती है कि बंटवारा केवल भूगोल का नहीं था; यह स्मृतियों, रिश्तों, भाषाओं, मोहल्लों और पहचान का भी बंटवारा था। यही कारण है कि फिल्म का सबसे बड़ा विषय ‘वापसी’ है—उस घर की ओर वापसी जो अब शायद अस्तित्व में नहीं है, उस समय की ओर वापसी जो लौटकर नहीं आ सकता, और उन लोगों की ओर वापसी जो स्मृतियों में ही जीवित हैं।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत नसीरुद्दीन शाह हैं। उनका अभिनय कई दृश्यों में शब्दों से अधिक प्रभावशाली हो जाता है। चेहरे की झुर्रियों, आंखों की नमी और आवाज की थरथराहट में एक पूरी पीढ़ी का दर्द दिखाई देता है। दिलजीत दोसांझ अपनी सहजता से प्रभावित करते हैं, जबकि शरवरी और वेदांग रैना कहानी को युवा ऊर्जा प्रदान करते हैं। वेदांग रैना विशेष रूप से कई दृश्यों में ध्यान आकर्षित करते हैं।
ए.आर. रहमान का संगीत फिल्म की आत्मा है। रहमान यहां केवल गीत नहीं देते, बल्कि स्मृतियों और भावनाओं का एक ध्वनि-दृश्य संसार रचते हैं। कई दृश्य संगीत और मौन के संयोजन से ऐसे बनते हैं कि दर्शक स्वयं को पात्रों के साथ बहता हुआ महसूस करता है।
फिल्म का अंतिम एक घंटा इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। यहीं पर कहानी का भावनात्मक संचय विस्फोट की तरह सामने आता है। नई दिल्ली में आयोजित मीडिया शो के दौरान भी यह दृश्य देखने को मिला कि जो पत्रकार और समीक्षक शुरुआत में सामान्य नोट्स ले रहे थे, वही अंत तक पहुंचते-पहुंचते भावुक हो उठे। फिल्म समाप्त होने पर सभागार में कुछ चेहरों पर आंसू और कई आंखों में नमी साफ दिखाई दे रही थी। किसी फिल्म के लिए इससे बड़ी सफलता क्या हो सकती है कि वह अपने दर्शक को भावनात्मक रूप से स्पर्श कर सके?
फिल्म पूरी तरह निर्दोष नहीं है। इसकी गति कुछ स्थानों पर धीमी पड़ती है और कुछ दृश्य थोड़े संपादन की मांग करते हैं। लेकिन इन कमियों के बावजूद फिल्म का भावनात्मक प्रभाव इतना प्रबल है कि दर्शक उन्हें आसानी से नजरअंदाज कर देता है।
यही कारण है कि अधिकांश समीक्षकों ने इसे विभाजन की पृष्ठभूमि पर बनी एक संवेदनशील और मानवीय फिल्म बताया है। आलोचकों ने विशेष रूप से इसके अभिनय, संगीत और भावनात्मक गहराई की प्रशंसा की है।
‘मैं वापस आऊंगा’ उन फिल्मों में नहीं है जिन्हें केवल बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों से मापा जाए। यह स्मृतियों, इतिहास और इंसानी रिश्तों की ऐसी यात्रा है जो दर्शक के मन में फिल्म समाप्त होने के बाद भी लंबे समय तक बनी रहती है। यदि सिनेमा का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं बल्कि मनुष्य को उसके अतीत और उसकी संवेदनाओं से जोड़ना भी है, तो इम्तियाज़ अली की यह फिल्म उस उद्देश्य को काफी हद तक पूरा करती है।
रेटिंग: 4/5 स्टार
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