जी-7 दुनिया की सात प्रमुख औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं यानी अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और कनाडा का समूह है। इसके बावजूद भारत को लगातार आमंत्रित किया जाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका और प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी रवाना होने से पहले कहा कि G-7 में भारत की लगातार उपस्थिति वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) की आवाज के रूप में देश के बढ़ते महत्व को दर्शाती है।
हालांकि सम्मेलन के कई मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सबसे अधिक चर्चा प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की संभावित द्विपक्षीय बैठक को लेकर हो रही है। अमेरिकी प्रशासन और विभिन्न मीडिया रिपोर्टों ने पुष्टि की है कि दोनों नेताओं की मुलाकात सम्मेलन के दौरान होगी। यह पिछले लगभग 16 महीनों में दोनों नेताओं की पहली आमने-सामने की बैठक होगी।
इस मुलाकात के कई मायने हैं। एक ओर भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही है, वहीं दूसरी ओर पश्चिम एशिया की अस्थिर स्थिति, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं जैसे मुद्दे भी दोनों देशों के एजेंडे में शामिल हैं। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार व्यापार वार्ता पर चर्चा होगी, हालांकि किसी अंतिम समझौते की संभावना फिलहाल कम है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जी-7 के मंच पर मोदी-ट्रंप मुलाकात केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं होगी। यह उस बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का भी संकेत होगी जिसमें भारत अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया का महत्वपूर्ण भागीदार बनकर उभर रहा है। यही कारण है कि जी-7 जैसी संस्था, जिसके निर्णय विश्व अर्थव्यवस्था और राजनीति को प्रभावित करते हैं, भारत को लगातार अपने साथ बैठाना चाहती है।
फ्रांस में होने वाला यह सम्मेलन ऐसे समय आयोजित हो रहा है जब दुनिया ईरान संकट, ऊर्जा आपूर्ति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, व्यापारिक तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे में भारत की भागीदारी और मोदी-ट्रंप वार्ता दोनों पर दुनिया भर की निगाहें टिकी हुई हैं।
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