पहला पन्ने पर यह लिखा है कि किसी पड़ोसी पर किए जाने वाला भरोसा कभी भी किसी खतरे को आमंत्रित कर सकता है। आपसी विश्वास की हत्या का यह नया कोना है। घर की महिला उन्हें बड़े विश्वास से अपने घर में बिठाती है और आवभगत में लग जाती है। यही आवभगत उसे बदहवासी तक ले जाती है। दोनों बच्चे अपने बचपन में सीखे जाने वाले सामाजिक व्यवहार की अभी तो सीढ़ियां ही चढ़ रहे थे कि कोई अपने जैसा आता है और उनकी जान ले लेता है।
दूसरा पन्ना मजहब की कहानी कहने व सुनने पर मजबूर हो जाता है। क्या साजिद व जावेद किसी किताब की पंक्तियों को पढ़कर उसे फर्ज तो न मान बैठे ? क्या वे जहरीले मौलवियों की बातों में आकर खुद को ऐसा बना बैठे कि कुफ्र और ईमान का सबक सिखाने चल पड़े? उन मासूम बच्चों से किसी की भला क्या दुश्मनी हो सकती है? मासूम बच्चों का कत्ल करने की बात भला किसी के जेहन में आ कैसे सकती है? कोई और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कारण तो दिख नहीं रहा है। इसी कारण से मजहब पर विचार करना पड़ रहा है। इसका असर पूरे देश पर होने वाला है। ये बच्चों की लाश नहीं हैं, यह उस तथाकथित भाईचारे और गंगा-जमुनी तहजीब की लाश है। साथ ही संकेत भी ऐसे हैं कि मातम भी सोच-समझ कर मनाइए।
तीसरे पन्ने पर राजनीति का विद्रूप चेहरा छपा है। चुनाव आने वाले हैं। मुसलमानों का वोट लेना है। लिहाजा, निन्दा भी चासनी में लिपटी होनी चाहिए। सपा ने अपना चेहरा ऐसा बना लिया है कि वह डरावना हो गया है। ऐसा लगने लगा है कि सपा अपनी धार्मिक यानी मुस्लिम राजनीति व जातीय राजनीति के सहारे ही सत्ता तक पहुँच बनाना चाहती है। संभवतः उन्हें यह बात समझ नहीं आ रही है कि उनके इसी रवैये के कारण ही आज उनकी यह स्थिति बन गई है कि वे उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर बैठे हैं। ऐसा लगता है कि वे इन हत्यारों के बचाव में खड़े हैं। यह सोच भयावह है। यह सपा के और नीचे गिरने का नया स्तर है। साम्प्रदायिक तनाव फैलाने का आरोप लगाकर सपा अपने मानसिक दिवालिएपन को ही उजागर कर रही है।
अगले पन्ने पर आने वाले खतरे का संकेत दर्ज है। यह बदलती राजनीति से भी आपका परिचय है। दोनों बच्चों की हत्या ने एक बार फिर से समाज को झकझोरा है। आपसी अविश्वास की खाई और गहरी होती दिख रही है। कन्हैयालाल की हत्या, उमेश कोल्हें की हत्या, नूपुर शर्मा को धमकी और ऐसे न जाने कितने मामले ऐसे हैं जो समाज को उस ओर धकेल रहे हैं जहां सद्भाव को अग्नि समाधि दे दी गई है और लगातार नई चिताएं सजाई जा रही है। उस परिवार की पीड़ा से न जुडने को उद्धत कुछ राजनीतिक दलों को लगता होगा कि वे अपना वोट साध रहे हैं किन्तु वे इस बात की समझ से कोसों दूर हैं कि उनकी राजनीति ही सुपुर्दे खाक होने वाली है।
अगली बात उन लोगों के लिए लिखी गई है जो बात-बेबात छाती पीटने, विलाप करने, ट्वीट करने, मोमबत्ती लेकर मार्च करते थे। आज मौन हैं। उसकी वजह भी है। हत्यारे मजहबी हैं। उनके खिलाफ बोलने में जबान कट जाती है। राजनीतिक रूप से सही होने की जो छिछोरी मानसिकता राजनेताओं में घर कर गई है, वह आने वाले समय में घातक सिद्ध होगी। चुनाव आएंगे-जाएंगे, नेता रहेंगे, नहीं रहेंगे किन्तु धर्मान्धता का ज्वालामुखी समाज को कहीं का नहीं छोड़ेगा। दोनों समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ रहा है। तलवारें खिंचेंगी। तलवारों की संख्याएं भी बढ़ेंगी। आवश्यकता उस उत्स को पहचानने की है जहां से ऐसे विचार मन में आते हैं। कौन पहचान करेगा? काम कठिन है। राह भी लम्बी है।
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