इस मौके पर श्री सत्य साई यूनिवर्सिटी फॉर ह्यूमन एक्सीलेंस के संस्थाथक श्री सद्गुरु मधुसूदन साई, राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष पद्मभूषण रामबहादुर राय और कलागुरु, केंद्र की ट्रस्टी पद्मविभूषण सोनल मानसिंह की विशेष मौजूदगी रही। स्वागत केंद्र की निदेशक डॉ. प्रियंका मिश्रा ने किया। सद्गुरु ने इस अवसर पर योग कर्मसु कौशलम का उल्लेख करते हुए कहा कि आज कलाओं के साथ कलाकारों के भी संरक्षण की आवश्यकता है। दूसरी ओर श्री राय ने ज्ञान के क्षेत्र में गुरु, सिद्ध और सद्गुरु की श्रेणियां बताईं और कहा कि गुरु शिक्षा देने वाला, जबकि एक सिद्ध गुरु से भी अधिक विज्ञ होता है। जबकि सद्गुरु इन दोनों से ऊपर हुआ करते हैं।
इस अवसर पर श्री सद्गुरु मधुसूदन साई ने कहा कि कला चेतना का ही विस्तार है। मनुष्य जिस उद्देश्य के लिए धरती पर आता है, वह पूरा नहीं हो तो एक कमी सी रह जाती है। इसके विपरीत कलाकार सदैव अपने कार्य- धर्म से ही जुड़े होते हैं। कला क्षेत्र के अंदर कोई ढील नहीं होती। अपनी यूनिवर्सिटी के बारे में उन्होंने कहा कि वहां जाति, धर्म से अलग मानवता के उत्थान की कोशिशें की जा रही हैं। उन्होंने श्री रामबहादुर राय के इस सुझाव को माना कि दीक्षांत समारोह को समावर्तन कहा जाना चाहिए। श्री सद्गुरु के पूर्व श्री राय ने बताया था कि यह शब्द कला केंद्र के डीन प्रो. प्रतापानंद झा ने दिया है। श्री राय जिस एसजीटी यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति हैं, वहां इसे लागू कर दिया गया है। श्री सद्गुरु ने सुप्रसिद्ध कलागुरु सोनल मानसिंह के इस सुझाव को भी मान लिया कि कनार्टक स्थित उनकी यूनिवर्सिटी मानवता को केंद्र में रखते हुए जिस 100 दिन का आयोजन करने जा रही है, वह अब 101 दिनों का होगा। इसमें 100 देशों के छात्र-शिक्षक और कला पारखी शामिल होंगे।
सद्गुरु ने अनुबंध के मुद्दे तय करने में डॉ. रेवती रामचंद्रन की भूमिका को सराहा। उन्होंने समझौते को एक भाव से किये जा रहे कार्य के लिए संकल्प कहा। सद्गुरु ने इसे समझौता नहीं, समझ बताया। जानकारी दी कि उनकी इनकी यूनिवर्सिटी में उत्तर की मीरा और कबीर के साथ दक्षिण के त्यागराज की देन का भी अध्ययन किया जाता है। यूनिवर्सिटी ने लगभग 200 वाद्ययंत्रों अथवा ध्वनियों के माध्यम से प्रस्तुति देने वाले कलाकारों की टुकड़ी भी बनाई है। उसे कभी दिल्ली लाने का भी उन्होंने भरोसा दिया।
राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने कहा कि हमने धर्म और संप्रदायों की सीमा बना ली है। इससे अलग सद्गुरु की यूनिवर्सिटी मानवता को केंद्र में रखकर शिक्षण-प्रशिक्षण का कार्य कर रही है। उन्होंने गुरुदेव रवींद्र के शांति निकेतन को याद किया, एसजीटी को उससे जोड़ा और कहा कि श्री सत्य साई यूनिवर्सिटी फॉर ह्यूमन एक्सीलेंस तो एक महाशांति निकेतन है। उन्होंने जोड़ा कि नई पीढ़ी की तमन्ना आक्सफोर्ड और कैंब्रिज जाने की होती है। सद्गुरु के केंद्र को देखकर सम्भव है कि दुनिया के लोग भारत आएं! दोनों संस्थाओं का सम्मिलन हुआ है, उससे शक्ति पैदा होगी|
पद्मविभूषण सोनल मानसिंह ने अपने संबोधन में माना कि जो भी करो, वह बहुत कम होता है। यह श्री सद्गुरु मधुसूदन साई के कार्य से परिलक्षित होता है। डॉ. सोनल मानसिंह ने दोनों संस्थाओं के बीच सहमति को समझौता नहीं, बल्कि महाकुंभ की संज्ञा दी।
कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने सद्गुरु ने 101 दिन-100 देश के कार्यक्रम को मानवता के लिए एक यज्ञ बताया। उन्होंने अपने केंद्र के बारे में कहा कि अध्यक्ष श्री राय के नेतृत्व में हमने इस संस्था को एकसूत्री सरकारी की जगह बहुआयामी संगठन बनाने का प्रयास किया है।
कला केंद्र में कलाकोश के विभागाध्यक्ष प्रो. सुधीर लाल ने आभार जताते हुए इस अवसर को योग और कला का संगम निरूपित किया। उन्होंने कहा कि यह प्रारम्भ नहीं है, इसके पहले भी केंद्र ने सद्गुरु के विश्वविद्यालय से बहुत कुछ लिया है। यह सातत्य है और चलता रहेगा। प्रारम्भ में श्री सत्य साई यूनिवर्सिटी फॉर ह्यूमन एक्सीलेंस के छात्रों ने कबीर के भजन के साथ पंढरपुर यात्रा के संदर्भ-गायन सुनाये। दोनों संस्थाओं की प्रगति यात्रा पर फिल्में भी दिखाई गयीं। संचालन केंद्र में सीआईएल के सहायक प्रोफेसर सुमित डे ने किया।
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