‘राम नवमी’ को ही धरा पर अवतरित होने वाले स्तुत्य साहित्यकार पं विलास बिहारी झा के गीत मर्म को गहरे तक स्पर्श करते हैं। वे पद्य और गद्य पर समान अधिकार रखते थे। बाल-साहित्य और कथा-साहित्य में उनके योगदान को भी आदर पूर्वक स्मरण किया जाता है। उपन्यास के शिल्प में लिखी गयी उनकी आत्म-कथा ‘सुनो मनोरम!’ को प्रचूर प्रसिद्धि मिली। यश की लिप्सा से दूर, अपने सुदीर्घ जीवन का सर्वाधिक भाग उन्होंने साहित्य की एकांतिक सेवा में अर्पित किया।
यह बातें रविवार को, उनकी जयंती पर, साहित्य सम्मेलन में आयोजित सम्मान-समारोह और कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन-अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि विलास बिहारी जी छात्र-जीवन में ही ‘कविता-सुंदरी’ से प्रेम कर बैठे। जीवन-पर्यन्त साहित्य की एकांतिक-साधना की। उसी में रमे रहे। उनकी क़िस्सा-गोई भी रोचक-रोमांचक थी। इसीलिए उनकी बाल-कथाएँ ख़ूब लोकप्रिय हुईं। आकाशवाणी से भी उनका गहरा संबंध था। उनके गीतों के अनेक प्रसारण हुए। दक्षिण-भारत में हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रचार में उनका बड़ा योगदान था। उनकी प्रेरणा से अनेक तमिल साहित्याकारों ने हिन्दी सीखी और हिन्दी में रचनाएँ की।
सम्मेलन अध्यक्ष ने इस अवसर पर, सुप्रसिद्ध बाल-साहित्यकार और हिन्दी बाल साहित्य शोध संस्थान, दरभंगा के संस्थापक डा सतीश चंद्र भगत को ‘पं विलास बिहारी झा स्मृति बाल-साहित्य-साधना सम्मान’ से अलंकृत किया। सम्मान स्वरूप डा भगत को वन्दन-वस्त्र, सम्मान-पत्र,स्मृति-भेंट तथा पाँच हज़ार एक सौ रूपए की सम्मान-राशि प्रदान की गयी।
आरंभ में पं झा की पुत्री निभा चौधरी ने अपने पिता के साहित्यिक व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए कहा कि यों तो वे एक बैंक अधिकारी थे, किंतु उनके जीवन का सबसे बड़ा ध्येय था लेखन-कार्य। वे सदैव योग और चिंतन की मुद्रा में रहा करते थे। हर क्षण कुछ नया रचते रहते थे। उन्होंने मात्र आठ वर्ष की आयु में ‘चिहुक चिहुक चहकी वन चिड़ियाँ’ नामक अपनी पहली कविता लिखी थी। उनके बाल-उपन्यास ‘आठ हज़ार वर्ष का बालक’ के लिए उन्हें 2006 में भारत के सर्वश्रेष्ठ बाल-साहित्यकार का सम्मान मिला था।
इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरंभ चंदा मिश्र की वाणी-वंदना से हुआ। सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद, वरिष्ठ कवि डा रत्नेश्वर सिंह, बच्चा ठाकुर, डा पुष्पा जमुआर, ईं अशोक मिश्रा, वीरेंद्र भारद्वाज, डा आर प्रवेश, निभा सहाय, डा कुंदन लोहानी, अश्विनी कुमार आदि कवियों और कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। मंच का संचालन कुमार अनुपम ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।
प्रोफ़ेसर राम ईश्वर पण्डित, डा प्रेम प्रकाश, प्रवीर कुमार पंकज, विजय कुमार सिंह, डा प्रेम अग्रवाल, नन्दन कुमार मीत, डा एस पी अग्रवाल, कुमारी मेनका, अमन वर्मा, मोहम्मद ज़फ़र आदि प्रबुद्धजन उपस्थित थे।
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