पश्चिम बंगाल में 152 सीटों पर मतदान, बीजेपी और टीएमसी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न

पश्चिम बंगाल में 23 अप्रैल को होने जा रहे विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान सत्तारूढ़ ममता बनर्जी और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व, खासकर नरेंद्र मोदी के लिए सीधी प्रतिष्ठा की लड़ाई में बदल गया है। चुनावी तैयारियों, सुरक्षा बंदोबस्त और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच राज्य में मुकाबला पूरी तरह से टीएमसी बनाम भाजपा के रूप में सिमटता दिख रहा है, जिसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी “हाई-स्टेक बैटल” करार दिया है।

Written By : रामनाथ राजेश | Updated on: April 22, 2026 10:54 pm

पश्चिम बंगाल की कुल 294 सीटों में से पहले चरण में 152 सीटों पर मतदान होना है। इन सीटों पर लगभग 3.6 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे, जबकि मैदान में करीब 1,478 उम्मीदवार हैं। दो चरणों (23 और 29 अप्रैल) में होने वाले इस चुनाव की मतगणना 4 मई को होगी। पहले चरण का यह दायरा ही चुनावी तस्वीर तय करने वाला माना जा रहा है, क्योंकि इन्हीं क्षेत्रों में पिछले चुनाव में भाजपा ने अपनी सबसे मजबूत पैठ बनाई थी।

चुनाव आयोग ने इस बार सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। राज्य भर में 8,000 से अधिक ‘सुपर-सेंसिटिव’ बूथ चिन्हित किए गए हैं, जहां केंद्रीय बलों की भारी तैनाती की गई है। कई इलाकों में अर्धसैनिक बलों के फ्लैग मार्च लगातार जारी हैं। आयोग के निर्देश पर मतदान के दिन उम्मीदवारों की गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी और किसी भी तरह के मतदाता भयादोहन पर तुरंत कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं।

इसके समानांतर, चुनाव से पहले की कार्रवाई में अब तक ₹1000 करोड़ से अधिक की नकदी, सोना और अन्य सामग्री जब्त की जा चुकी है, जो चुनावी प्रक्रिया में धनबल के इस्तेमाल को लेकर गंभीर संकेत देता है। इसके अलावा, पहले चरण की 129 सीटों को ‘रेड अलर्ट’ श्रेणी में रखा गया है, जहां तीन या उससे अधिक आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। कुल मिलाकर, करीब 23% उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

राजनीतिक स्तर पर यह चुनाव दोनों दलों के लिए अस्तित्व और विस्तार की परीक्षा बन गया है। भाजपा, जिसने पिछले चुनाव में बंगाल में अपनी अभूतपूर्व बढ़त दर्ज की थी, इस बार सत्ता हासिल करने के लक्ष्य के साथ मैदान में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्य में दर्जनों रैलियां कर चुनाव को राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बना दिया है। भाजपा का फोकस “घुसपैठ, विकास और कानून-व्यवस्था” पर है।

वहीं, ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी इसे “बाहरी बनाम बंगाल” की लड़ाई के रूप में पेश कर रही है। पार्टी का आरोप है कि भाजपा केंद्रीय एजेंसियों और बलों के जरिए मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है। टीएमसी ने यहां तक आरोप लगाया कि बाहरी मतदाताओं को लाने के प्रयास किए जा रहे हैं, जबकि भाजपा इन आरोपों को खारिज कर रही है।

चुनाव में सामाजिक और आर्थिक असमानता का पहलू भी उभर कर सामने आया है। एक ओर जहां करोड़ों की संपत्ति वाले उम्मीदवार मैदान में हैं, वहीं कुछ प्रत्याशियों की घोषित संपत्ति ₹500 तक है। महिला भागीदारी में भी वृद्धि दर्ज की गई है—इस बार करीब 385 महिला उम्मीदवार मैदान में हैं, जो कुल का लगभग 13% है।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी इस चुनाव को खास तवज्जो दी है। कुछ रिपोर्ट्स में मतदाता सूची से लाखों नाम हटाए जाने और इससे चुनावी निष्पक्षता पर उठे सवालों को प्रमुखता से उठाया गया है, जिससे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बहस तेज हुई है।

जमीनी स्तर पर, बेरोजगारी, कल्याणकारी योजनाएं, आर्थिक संकट और पहचान की राजनीति जैसे मुद्दे मतदाताओं के बीच प्रमुख बने हुए हैं। लेकिन जिस तरह से दोनों प्रमुख दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है, उससे साफ है कि यह चुनाव अब सिर्फ नीतियों का नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व और नेतृत्व की विश्वसनीयता की लड़ाई बन चुका है।

ऐसे में पहले चरण का मतदान केवल सीटों का आंकड़ा तय नहीं करेगा, बल्कि यह भी संकेत देगा कि बंगाल की राजनीति में किसका पलड़ा भारी है—ममता बनर्जी का क्षेत्रीय किला या नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा का विस्तार अभियान।

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