जीवन में विज्ञान और दूसरे पक्षों पर बात करते हुए उन्होंने कहा, “जीवन समग्रता में है और विज्ञान एक पहलू है उसका। कला-संगीत अगर उसके साथ नहीं है, तो उसमें अधूरापन है।” रवींद्र शर्मा ‘गुरुजी’ को उद्धृत करते सुरेश सोनी ने कहा, “गुरुजी दो वाक्य कहा करते थे कि छोटी टेकनोलॉजी मालिक बढ़ाती है समाज में और बड़ी टेकनोलॉजी नौकर बढ़ाती है- यह पहला वाक्य था उनका। दूसरा था, छोटी टेकनोलॉजी को समाज व्यवस्थित करता है। बड़ी टेकनोलॉजी समाज को व्यवस्थित करती है। मेरे ब्रांड में आओ, मेरे डिजाइन के अंदर आओ, मेरे मॉडल के अंदर तुम सामंजस्य बढ़ाओ। वो मालिक हो जाता है।”
उन्होंने कहा, गुरुजी ने जो बातें कही हैं, वो केवल शब्द नहीं है, केवल बौद्धिक व्यायाम नहीं हैं, वो एक जीता जागता एक अनुभूत जीवन है। यह जो उनका समग्र वाङ्मय बना है, इसका प्रचार-प्रसार हो और हम सब मिलकर इसको अधिक से अधिक आगे बढ़ा सकें, इसके लिए परमात्मा हमको सामर्थ्य दे।
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा, “विचार की दृष्टि से, चिंतन की दृष्टि से जब हम भारतीय ज्ञान परम्परा की बात कहते हैं तो इसक संदर्भ सिर्फ पाठ्यक्रमों तक सीमित न रहकर जीवन में कैसे उतर सकता है, यह गुरुजी का पूरा वाङमय और गुरुजी का जीवन दर्शन बताता है। आने वाले समय में निश्चित तौर पर इसकी बहुत अधिक आवश्यकता भी है, क्योंकि जैसे-जैसे पूरे विश्व में चुनौतियां बढ़ती चली जा रही हैं, वैसे-वैसे हमें सबको यह आभास होने लगा है कि जो हमारी भारत की पारम्परिक जीवनशैली है, जिसमें आपका प्रकृति से तादात्म्य होता है और इसीलिए जो प्रकृति प्रदत्त अनुशासन है, जो हमें हमारे जीवन का मार्ग दिखाता है, वही आने वाले समय में न सिर्फ भारत को बल्कि संपूर्ण विश्व को राह दिखाने वाला है। अगर इस संदर्भ में गुरुजी का वाङमय, गुरुजी का विचार दर्शन कहीं सहायता करता है तो हमें उसकी सहायता निश्चित तौर पर लेनी चाहिए।” आईजीएनसीए के कलाकोश के विभागाध्यक्ष और भारत विद्या प्रयोजना के निदेशक प्रो. (डॉ.) सुधीर लाल ने पूरे दिन के विमर्श का सार प्रस्तुत किया।
इससे पूर्व, उद्घाटन सत्र में प्रो. (डॉ.) सुधीर लाल ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की। उद्घाटन सत्र में जहां रविन्द्र शर्मा ‘गुरुजी’ के जीवन, कार्यों और विरासत पर आधारित डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘क्रांतदर्शी गुरुजी’ के टीजर लॉन्च किया गया, वहीं इस एकदिवसीय आयोजन का समापन इसी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता डॉक्यूमेंट्री फिल्म के प्रदर्शन के साथ हुआ।
जीविका आश्रम के आशीष गुप्ता ने संपादकीय वक्तव्य देते हुए गुरुजी के चिंतन की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति प्रो. राणा प्रताप सिंह तथा विशिष्ट अतिथि केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने अपने उद्बोधनों में भारतीय चिंतन पर आधारित शिक्षा मॉडल, स्वदेशी ज्ञान-विज्ञान और सांस्कृतिक स्वाभिमान के महत्व को रेखांकित किया।
इस अवसर पर ‘भारत गाथा’ एवं ‘भारत कथा’ शृंखला के 15 खंडों का औपचारिक लोकार्पण मंचासीन अतिथियों ने किया। उद्घाटन सत्र के उपरांत आयोजित कार्यशाला के प्रथम सत्र ‘भारत गाथा’ में रविन्द्र शर्मा गुरुजी के विचारों पर आधारित वीडियो प्रस्तुति दिखाई गई। इसके बाद ‘शिक्षाविधि, प्रौद्योगिकी, घर-व्यवस्था’ विषय पर गांधी आश्रम, नई दिल्ली के लक्ष्मी दास ने अपने विचार रखे। आईआईटी दिल्ली के प्रो. विजय चेरीयार ने भारतीय ज्ञान प्रणाली, डिजाइन, कला और समाज व्यवस्था के अंतर्संबंधों पर विस्तार से चर्चा की। वहीं एलबीएसएनएसयू, दिल्ली के कुलसचिव प्रो. पवन कुमार शर्मा ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था और भारतीय समाज व्यवस्था के आधारभूत तत्त्वों पर अपना व्याख्यान दिया।
द्वितीय सत्र ‘भारत कथा’ में पुनः गुरुजी के विचारों की वीडियो प्रस्तुति के साथ चर्चा प्रारम्भ हुई। जीविका आश्रम के आशीष गुप्ता ने ‘मसूरी संवाद’ और ‘विजयनगर संवाद’ पर अपने विचार रखे। सेवा इंटरनेशनल के डॉ. आर.के. अनिल ने ‘आदिलाबाद संवाद’ विषय पर प्रस्तुति दी। इस सत्र की अध्यक्षीय टिप्पणी जामिया मिलिया इस्लामिया के कुलसचिव प्रो. मोहम्मद महताब आलम रिज़वी ने दी।
दिनभर चले इस आयोजन में भारतीय ज्ञान परम्परा, शिक्षा-दर्शन, समाज व्यवस्था, ग्राम्य जीवन, तकनीक, स्वदेशी दृष्टि और सांस्कृतिक पुनर्जागरण जैसे विषयों पर सारगर्भित चर्चा हुई।
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