महागठबंधन का यह फैसला राजनीतिक रूप से बेहद सोचा-समझा कदम है। तेजस्वी यादव जहां यादव-मुस्लिम (MY) समीकरण के प्रतिनिधि हैं, वहीं मुकेश सहनी निषाद (मल्लाह) समुदाय से आते हैं, जो राज्य की जनसंख्या का करीब 7-9 प्रतिशत हिस्सा है। गठबंधन का मकसद है — यादव, मुस्लिम, अति पिछड़ा, निषाद और दलित वोटों को एक साथ लाकर एक नया सामाजिक गठजोड़ तैयार करना। कांग्रेस नेता अशोक गहलोत की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि दिल्ली हाई कमांड ने इस फार्मूले को मंजूरी दे दी है। गहलोत ने कहा कि ‘यह फैसला बिहार के सामाजिक ताने-बाने को साथ लाने की दिशा में है।’
सीट मुकाबला करने वाले दल विवरण
-लालगंज (वैशाली) राजद बनाम वीआईपी दोनों दलों ने अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं, सीट वीआईपी अपनी पारंपरिक बताती है।
-राजापाकर (वैशाली) राजद बनाम कांग्रेस कांग्रेस ने महिला प्रत्याशी उतार दी जबकि राजद पीछे हटने को तैयार नहीं।
-बछवाड़ा (बेगूसराय) राजद बनाम वामदल (CPI) वामदल का दावा कि यह सीट 2020 में उसने जीती थी।
-बिहार शरीफ (नालंदा) कांग्रेस बनाम वामदल कांग्रेस ने नया चेहरा उतारा, वामदल ने पुराने उम्मीदवार को टिकट दिया।
रोसरा (समस्तीपुर) राजद बनाम वीआईपी सहनी के समर्थक यहां अपने उम्मीदवार के नाम वापस नहीं ले रहे।
सिकंदरा (जमुई) राजद बनाम वामदल दोनों के बीच समन्वय वार्ता विफल रही।
वैशाली (मुख्य क्षेत्र) राजद बनाम कांग्रेस सीट पर उम्मीदवार चयन को लेकर गतिरोध बरकरार।
ताजा रिपोर्ट बताती है कि महागठबंधन में ‘फ्रेंडली फाइट’ वाली इन सीटों की संख्या अब 11 तक पहुँच सकती है, क्योंकि लेफ्ट दल (CPI-ML, CPI, CPM) ने कुछ स्थानों पर अपने प्रत्याशी नहीं हटाए हैं।
तेजस्वी यादव अब तीसरी बार मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बने हैं। 2020 के चुनाव में वे सबसे बड़े दल के नेता बने थे, लेकिन सत्ता से दूर रहे। उनके सामने अब दोहरी चुनौती है — एनडीए की मज़बूत संगठनात्मक मशीनरी से टक्कर, और गठबंधन के अंदर मतभेदों को नियंत्रित करना। वहीं मुकेश सहनी के लिए यह घोषणा राजनीतिक पुनर्वास का अवसर है। एनडीए से अलग होने के बाद उन्हें फिर से एक बड़ी भूमिका मिली है।
सहनी ने कहा — ‘यह पहली बार है जब किसी मल्लाह के बेटे को उपमुख्यमंत्री का चेहरा बनाया गया है।’ हालांकि, जिन सीटों पर उनके उम्मीदवार राजद से टकरा रहे हैं, वहाँ यह ‘साझेदारी’ जमीन पर कितनी टिकेगी, यह कहना मुश्किल है।कांग्रेस इस गठबंधन में सीटों की संख्या को लेकर पहले ही असंतोष जता चुकी है। अशोक गहलोत की उपस्थिति का मकसद यही था कि मतभेदों के बीच पार्टी को ‘सम्मानजनक भागीदारी’ का भरोसा दिया जा सके।
गहलोत ने कहा — ‘कुछ सीटों पर फ्रेंडली फाइट हो सकती है, लेकिन लक्ष्य एक है — एनडीए की सरकार को रोकना।’ महागठबंधन की यह घोषणा निश्चित रूप से बिहार की राजनीति में नया मोड़ है — यह सामाजिक समावेश का प्रतीक है और विपक्ष को एक साझा चेहरा देती है। लेकिन जमीनी स्तर पर जारी ‘दोस्ताना संघर्ष’ और सीट बंटवारे की खींचतान बताती है कि गठबंधन की एकजुटता अभी भी अधूरी है। यदि तेजस्वी यादव इस असंतोष को नियंत्रित कर अपने सहयोगियों को एक मंच पर रख पाने में सफल होते हैं, तो यह चुनावी समीकरण बदल सकता है। अन्यथा, यह वही स्थिति बन सकती है — जहाँ ‘दोस्ताना मुकाबला’ धीरे-धीरे वास्तविक नुकसान में बदल जाए।
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