प्रो. त्रिपाठी इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की ओर से डॉ. नामवर सिंह स्मृति व्याख्यानमाला के अंतर्गत सोमवार को ‘सांस्कृतिक बहुलतावाद और दूसरी परंपरा’ विषय पर बोल रहे थे। अध्यक्षता केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने की। इस अवसर पर दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय के कला एवं अभिकल्प संकाय के अधिष्ठाता तथा इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के पूर्व कलानिधि विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) रमेश चन्द्र गौड़ एवं वर्तमान कलानिधि विभागाध्यक्ष प्रो. के. अनिल कुमार उपस्थित रहे। कलानिधि विभाग की ओर से सम्पन्न व्याख्यान के मौके पर नामवर सिंह के लेख और व्याख्यानों वाली पुस्तक ‘मेरे बिसरे बिखरे शब्द’ का लोकार्पण भी हुआ। पुस्तक का सम्पादन विजय प्रकाश सिंह और वरुण भारती ने किया है।
इस अवसर पर अपना वक्तव्य रखते हुए प्रो. आशीष त्रिपाठी ने प्रो. नामवर सिंह की जन्मशती के अवसर को उनके व्यक्तित्व, वैचारिक अवदान तथा भारतीय बौद्धिक परंपरा में उनके विशिष्ट स्थान पर पुनर्विचार का महत्त्वपूर्ण अवसर बताया। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह का व्यक्तित्व भारतीय समाज की संवादधर्मिता का सशक्त उदाहरण था, जहाँ वैचारिक मतभेदों के बावजूद संवाद, सम्मान और परस्पर सीखने की परंपरा जीवित रहती है। उनके अनुसार, नामवर सिंह का जीवन आत्मनिर्भरता, वैचारिक स्वाधीनता और गहरे मानवीय सरोकारों से निर्मित था।
प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि नामवर सिंह को केवल एक साहित्यिक आलोचक के रूप में नहीं, बल्कि हिन्दी की व्यापक वैचारिक परंपरा के प्रतिनिधि के रूप में समझा जाना चाहिए। उन्होंने उनकी असाधारण अध्ययन परिधि का उल्लेख करते हुए कहा कि वे वेद, उपनिषद, संस्कृत, अपभ्रंश, मध्यकालीन और आधुनिक हिन्दी साहित्य, भारतीय भाषाओं तथा पाश्चात्य विचार परंपराओं के साथ समान अधिकार से संवाद स्थापित करने की क्षमता रखते थे। किंतु उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता केवल उनका व्यापक ज्ञान नहीं, बल्कि प्रत्येक विचारधारा के बीच अपनी स्वतंत्र वैचारिक दृष्टि को बनाए रखने का साहस था।
अपने व्याख्यान के दूसरे भाग में प्रो. त्रिपाठी ने नामवर सिंह की अवधारणा ‘दूसरी परंपरा की खोज’ पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट किया कि नामवर सिंह के यहाँ ‘दूसरी” का अर्थ ‘सेकंड’ नहीं, बल्कि ‘अन्य’ (अदर ) है। उनके अनुसार, भारत किसी एक परंपरा का देश नहीं, बल्कि अनेक परंपराओं का देश है। इसी कारण परंपरा को एकवचन में नहीं, बल्कि बहुवचन में समझना चाहिए। उन्होंने बताया कि नामवर सिंह ने “दूसरी परंपरा” के माध्यम से उन परंपराओं, विचारों और लोकधर्म की पहचान की, जो मुख्यधारा से बाहर होते हुए भी भारतीय सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न हिस्सा हैं।
इसी क्रम में उन्होंने ‘सांस्कृतिक बहुलता’ की अवधारणा को ‘दूसरी परंपरा’ का स्वाभाविक विस्तार बताया। उन्होंने कहा कि परंपराओं की बहुलता ही भारत की सांस्कृतिक बहुलता का आधार है। नामवर सिंह के चिंतन का सार यह है कि भारतीय समाज की वास्तविक शक्ति उसकी विविध परंपराओं, संवादशीलता और असहमति की परंपरा में निहित है। उन्होंने रेखांकित किया कि सांस्कृतिक बहुलता की रक्षा तभी संभव है जब समाज की उपेक्षित, सीमांत और लोक आधारित परंपराओं को समान गंभीरता से समझा और संरक्षित किया जाए।
विशिष्ट अतिथि प्रो. (डॉ.) रमेश चन्द्र गौड़ ने प्रो. नामवर सिंह के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का स्मरण करते हुए उनके भारतीय भाषाओं, साहित्य और सांस्कृतिक चिंतन में योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि जेएनयू में भारतीय भाषा केंद्र की स्थापना तथा भारतीय दृष्टि पर आधारित साहित्यिक विमर्श को सुदृढ़ बनाने में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह के शताब्दी वर्ष में उनके विचारों और साहित्यिक अवदान को व्यापक स्तर पर जन जन तक पहुँचाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
स्वागत एवं आधार वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए कलानिधि विभागाध्यक्ष प्रो. के. अनिल कुमार ने बताया कि कलानिधि विभाग का संदर्भ पुस्तकालय देश के प्रतिष्ठित विद्वानों, साहित्यकारों एवं कलाकारों के निजी संग्रहों के संरक्षण का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र है। उन्होंने जानकारी दी कि वर्तमान में पुस्तकालय में 25 प्रतिष्ठित विद्वानों के निजी संग्रह संरक्षित हैं, जिनमें प्रो. नामवर सिंह का निजी पुस्तक संग्रह भी सम्मिलित है, जिसे उन्होंने स्वयं कलानिधि को समर्पित किया था। प्रो. अनिल कुमार ने कहा कि प्रो. नामवर सिंह की स्मृति और उनके बौद्धिक अवदान के सम्मान में वर्ष 2019 से प्रतिवर्ष प्रो. नामवर सिंह स्मारक व्याख्यान का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें देश के प्रतिष्ठित विद्वानों को आमंत्रित कर समकालीन विषयों पर विमर्श आयोजित किया जाता है। उन्होंने कहा कि इस वर्ष का विषय “सांस्कृतिक बहुलता और दूसरी परंपरा” वर्तमान समय में भारतीय समाज की विविधता, संवाद और सहअस्तित्व की परम्परा को समझने की दृष्टि से विशेष रूप से प्रासंगिक है। कार्यक्रम में साहित्य, संस्कृति एवं शिक्षा जगत से जुड़े विद्वानों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा बड़ी संख्या में उपस्थित श्रोताओं ने सहभागिता की।
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