विजय जी ने उन सारे पत्रकारों और संपादकों को खोज निकाला और उनकी चर्चा की है जिन्होंने बिहार के समृद्ध पत्रकारिता की नींव रक्खी थी. ध्यातव्य है कि पूरे विश्व के पत्रकारिता के इतिहास में पत्रकारिता साहित्यकारों ने ही सम्हाला, सींचा और उसे बटवृक्ष के रूप में विकसित होने दिया. प्रारंभ से पत्रकारिता समाज की विसंगतियों को उजागर करती रही है.भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई में भी पत्रकारों की अहम भूमिका रही थी.
भारत आने के बाद मोहनदास करमचंद गांधी ने कई पत्रिकाएं निकाली जिससे तत्कालीन भारतीयों की सोच में परिवर्तन हुआ . यह पुस्तक एक ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह है जिसमें तत्कालीन बिहार में पत्रकारिता के विकास की विशद चर्चा की गई है. पुस्तक के प्रारंभ में विजय भास्कर जी लिखते हैं: “पत्रकारिता कर्म जल्दी में रचा गया इतिहास होता है। इसलिए किसी पत्रकार को इतिहास लेखन का दायित्व सौप दिया जाय तो यह कठिन परीक्षा की घड़ी हो जाती है।
आपकी परीक्षा आपकी तैयारी के हिसाब से हो, यह कभी कभार ही हो पाता है।” विजय जी। आगे लिखते हैं “….मुझे लगता है कि झारखंड के विस्तृत पत्रकारिता फलक पर अलग से काम करने की ज़रूरत है….. ” 206 पृष्ठ के इस पुस्तक के अनुक्रम को देखकर आपको इतना तो अनुमान हो ही जायेगा कि इस पुस्तक लेखन के क्रम में लेखक ने कितने पुस्कालयों और अभिलेखागार की खाक छानी होगी.
आपकी सुविधा के लिए कुछ अध्यायों के शीर्षक आपको बता दूँ. : 1.तूफान से गुजरता सफरनामा 2.निखरे अखबार और निखरी पत्र पत्रिकाएँ 3. जिले जिले तक पहुंची ज्योति 4. मैथिली,भोजपुरी और मगही भी पीछे नहीं 5. उर्दू की रही धूम 6. जाति ही पूछो 7. पत्रकारिता जिनकी ऋणी रहेगा 8. गंगा का पुराततवाङ्क 9. बिहारियों के लिए बिहार:आगाज से अंजाम तक 10. संपादक, जिन्होंने चंपारण को 1 पूरे देश का मुद्दा बना दिया 11. मुट्ठी से सरकती रेत 12. अखबार से आंदोलन तक का सफर 13. एक स्वर्णिम यात्रा 14. फैलता आकाश सिमटती दूरियाँ 15. धनबाद पत्रकार उत्पीड़न कांड 16. एक अल्पविराम 17. समर शेष है 18. 2011-2012 दाग हैं तो अच्छे हैं 19. दिग्गजों का शंखनाद.
इसके अतिरिक्त इस पुस्तक के अंत में ग्यारह परिशिष्ट भी जोड़े गए हैं जिस में सारे संदर्भों के प्रमाण और तस्वीरें भी दी गयी हैं. लेखक विजय भास्कर जी की भाषा बहुत समृद्ध और प्रवाहमान है. इस तथ्यपरक पुस्तक को पढ़ते समय आप कहीं ऊबते नहीं हैं. लेखक ने लिखा भी है कि सारे तथ्यों का समावेश एक छोटे पुस्तक में संभव नहीं था. पर अगर कुछ अध्यायों में और तथ्य होते तो पत्रकारिता में रुचि रखने वाला का अधिक भला होता. यह पुस्तक पत्रकारिता में रुचि रखने वालों के लिए पठनीय और अति संग्रहणीय है.
पुस्तक : बिहार में पत्रकारिता का इतिहास
लेखक : विजय भास्कर, पृष्ठ:206
प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन. मूल्य: रु.250/-

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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पुस्तक निश्चित ही पठनीय है, बहुत अच्छी समीक्षा !
लेखक और समीक्षक दोनों को बधाई 🙏
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