ग़ज़ल-गोष्ठी के साथ ‘लेख्य-मंजूषा’ का आठवाँ वार्षिकोत्सव हुआ संपन्न

"हमने सुना है इस सदी में पत्थर के दिल धड़केंगे/ इसीलिए जिस्मो-दिल को पत्थर बनाता जाता हूँ।" ग़ज़ल की इन पंक्तियों से बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने, लेख्य मंजूषा द्वारा आहूत दो दिवसीय आठवें वार्षिकोत्सव की ग़ज़ल-गोष्ठी का उद्घाटन किया।

बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन में कई कवियों ने की शिरकत
Written By : सुनिल वर्मा | Updated on: December 6, 2024 11:29 pm

सस्वर  पढ़ी गई उनकी ग़जल के हर शेर का श्रोताओं ने तालियों से स्वागत किया। उनके इस शेर को श्रोताओं ने ख़ूब पसंद किया कि “तड़प है कि तलब है कि ज़िद है बाक़ी/ यह दिल भी धड़कता है कि उम्मीद है बाक़ी’/ उठ गए हैं वो लोग जो रहे कभी ज़िंदा/ इस शहर में अब लाश और गिद्ध है बाक़ी।”

बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन
सुप्रसिद्ध ग़ज़ल-गो प्रेम किरण की अध्यक्षता में गुरुवार को संपन्न हुई इस ग़ज़ल-गोष्ठी में, उत्तरप्रदेश से पधारे मक़बूल शायर डा अब्दुल सुबहान खान, हिन्दी और भोजपुरी के वरिष्ठ कवि भगवती प्रसाद द्विवेदी, वेतिया से पधारे डा गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’, मधेपुरा से आए गजलगो डा सिद्धेश्वर प्रसाद, शुभ चंद्र सिन्हा, एम के मधु, क्षमा श्रीवास्तव, मो नसीम अख़्तर, डा मीना कुमारी परिहार, अमृतेश बाबू आदि शायरों ने अपनी यादगार ग़ज़लें पेश कीं।

ग़ज़ल-गोष्ठी के बाद भगवती प्रसाद द्विवेदी की अध्यक्षता में ‘काव्य-सत्र’ आरंभ हुआ, जिसमें पुणे से पधारीं कवयित्री सुपर्णा अशोक जाधव, नागपुर से आयीं डा ज्योति गजभिये, मुंबई की प्रभा शर्मा, नोएडा से डा शिखा तेजस्वी, बहराईच से पी के प्रचण्ड, जोधपुर से पधारे राजेंद्र पुरोहित, वरिष्ठ कवि मधुरेश नारायण, ऋचा वर्मा, सुधा पाण्डेय, शिप्रा वर्मा, प्रवीण कुमार श्रीवास्तव आदि कवियों और कवयित्रियों ने अपने काव्य-पाठ से श्रोताओं को हाथ खोलने पर विवश किया।

बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन
भोजनावकाश के पश्चात लेख्य मंजूषा, पटना तथा मंज़िल ग्रुप साहित्यिक मंच के संयुक्त तत्त्वावधान में प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम आयोजित हुआ,जिसमें जोधपुर के साहित्यकार राजेन्द्र पुरोहित को प्रथम, पटना के प्रवीण कुमार को द्वितीय तथा जबलपुर की कवयित्री डा अरुणा पाण्डेय को तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। इस प्रतियोगिता में डा उषा सिन्हा, अपराजिता रंजना, सीमा रानी, अब्दुल रफ़ी खान, डा नीलू अग्रवाल, सुधीर सिंह सुधाकर आदि अनेक साहित्यकारों ने भाग लिया।

समारोह का अंतिम सत्र आंचलिक भाषाओं को समर्पित था, जिसकी अध्यक्षता डा गोरख प्रसाद मस्ताना ने की। उन्होंने भोजपुरी में अपनी गीति-रचना “न जानी केतना के बेमार करी पइसा” सुनाकर श्रोताओं को मंत्र-मुग्ध कर दिया। वरिष्ठ कवि भगवती प्रसाद द्विवेदी, मधुरेश नारायण, कमल किशोर वर्मा ‘कमल’, सुधा पाण्डेय, डा मीना कुमारी परिहार, शुभचंद्र सिन्हा, राव शिवराज पाल सिंह, पी के प्रचण्ड आदि कवियों और कवयित्रियों ने राजस्थानी, अवधि, भोजपुरी, मगही, बज्जिका आदि आंचलिक भाषाओं में मोहक गीत-ग़ज़लों से श्रोताओं को आनन्द-विभोर कर दिया।

आयोजन का संचालन लेख्य मंजूषा की कर्मठ और विदुषी अध्यक्ष विभा रानी श्रीवास्तव ने किया। समारोह के अंत में उन्होंने आभार प्रकट करते हुए कहा कि गत बुधवार को रोटरी क्लब के सभागार से आरंभ हुए दो दिनों के इस उत्सव के दूसरे दिन बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के भव्य और ऐतिहासिक सभागार में संपन्न हुए लेख्य मंजूषा के आठवें वार्षिकोत्सव से हमें बहुत ही बल मिला है। दोनों ही दिन के सभी सत्र अत्यंत सफल और लाभकारी रहे। वैचारिक-सत्रों में राष्ट्रीय ख्याति की कथा-लेखिका प्रीतपाल कौर, डा अनीता राकेश, राव शिवराज आदि वरिष्ठ साहित्य-सेवियों का हमें मार्ग-दर्शन प्राप्त हुआ। देश के विभिन्न स्थानों से आए साहित्यकार बंधुओं और बहनों ने हमें उपकृत किया है, जिनके हम आभारी हैं।

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