पितृ-दिवस का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अपनी संतान के लिए एक माता-पिता अपने सभी सपनों और आकांक्षाओं का बलिदान कर देता है। और यह बात उनकी संतति को तबतक पता नहीं होती, जबतक कि वे स्वयं माता-पिता नहीं बनते। शायद उस समय तक भी नहीं, जबतक कि उनकी भी संतति, उन्हीं की भाँति उनकी अवहेलना नहीं करने लगती।
इस अवसर पर वरिष्ठ कवयित्री डा सुधा पाण्डेय के काव्य-संग्रह ‘कहाँ गए वो दिन’ का लोकार्पण भी किया गया। समारोह के मुख्य अतिथि और सुप्रसिद्ध साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी ने पुस्तक पर विस्तार पूर्वक चर्चा की और कवयित्री के व्यक्तित्व को शिक्षा, साहित्य और कला का त्रिवेणी बताया।
आयोजन की विशेषता यह रही कि ‘किलकारी बाल भवन’ के छात्र-छात्राओं ने ‘लघुकथा-साहित्य के पुरोधा डा सतीश राज पुष्करणा की एक लघुकथा ‘ख़ुदगर्ज़’ की नाट्य-प्रस्तुति भी की तथा उनकी तीन लघु कथाओं ‘दिखाबा’, ‘बदबू’ तथा ‘ऊँचाई’ पर विमर्श भी किया। इनमें अनुराग कुमार, अमितेश राज, अंकुश, राजवर्द्धन सिंह, प्रवीण कुमार, सुमन कुमार, अतुल राय, श्रेया कुमारी, ख़ुशी कुमारी, निमिषा कुणाल, निकु झा सम्मिलित थे। लघुकथा ‘फ़र्ज़’ की भी सुंदर नाट्य-प्रस्तुति हुई, जिसमें ईशांत, गीतिका, राजू, अल्पा,सौरव, रौशन, मोनु, आयुष, राजवीर,कनिष्क, आर्यन और अनिल तेजस के अभिनय को खूब सराहना मिली।
पितृ-दिवस पर संस्था की ओर से ‘दीप जल उठे’ नाटक का भी प्रदर्शन हुआ, जिसमें गार्गी राय, आरव श्रीवास्तव और शिवेश प्रसाद ने दर्शकों की ओर से तालियों का प्रसाद प्राप्त किया।
संस्था की अध्यक्ष और वरिष्ठ कथा-लेखिका विभा रानी श्रीवास्तव, डा शशि भूषण सिंह, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, शुभ चंद्र सिन्हा, डा अनिता राकेश, डा पूनम देवा, एम के मधु, डा प्रमोद कुमार, डा वीरेंद्र भरद्वाज, प्रेम लता सिंह राजपुत, प्रणय सिन्हा, रंजना सिंह, एकता कुमारी, डा पूनम आनन्द, अभिलाष दत्त, रवि भूषण श्रीवास्तव, प्रवीण कुमार श्रीवास्तव, उर्मिला वर्मा, अनीता मिश्र सिद्धि, नीता सिन्हा, आशा रघुदेव, तनुजा सिन्हा, नरेंद्र कुमार आदि कवियों और साहित्यकारों ने भी अपने विचार व्यक्त किए। मंच का संचालन वरिष्ठ कवि मधुरेश नारायण ने किया।
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