आईजीएनसीए में सिंधु-सरस्वती सभ्यता पर नए सिरे से मंथन

सिंधु-सरस्वती सभ्यता भारतीय उपमहाद्वीप के सांस्कृतिक और सभ्यतागत इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है। इसके पुरातात्त्विक अवशेष, बस्तियों की संरचना, भौतिक संस्कृति, अभिलेख और विभिन्न क्षेत्रों के साथ इसके संपर्क हमें उस समय के ज्ञान, जीवन-पद्धति, तकनीक और सांस्कृतिक विकास को समझने में मदद करते हैं। सिंधु लिपि, सभ्यता का भौगोलिक विस्तार और बाद की भारतीय परम्पराओं के साथ इसके संभावित सम्बंध आज भी विद्वानों के बीच अध्ययन और विमर्श का विषय हैं।

( बाएं से) प्रो. आलोक त्रिपाठी, प्रो यदुवीर रावत और प्रो संजय कुमार मृदुल
Written By : डेस्क | Updated on: October 1, 2026 8:56 pm

इसी संदर्भ में, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के भारत विद्या प्रयोजना प्रभाग, सिंधु सरस्वती प्रकोष्ठ और राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्रण मिशन ने शहीद भगत सिंह महाविद्यालय (सांध्य), दिल्ली विश्वविद्यालय के सहयोग से ‘सिंधु सरस्वती सभ्यता : साक्ष्य, अंतःक्रियाएं और सभ्यतागत निरंतरता’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया। सम्मेलन में पुरातत्त्व, इतिहास, अभिलेख-विज्ञान, भाषाविज्ञान, भू-विज्ञान और अन्य संबद्ध क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने भाग लिया। इसका उद्देश्य उपलब्ध पुरातात्त्विक, ऐतिहासिक, भाषाई और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर सिंधु-सरस्वती सभ्यता को समझना, नए शोधों और विभिन्न व्याख्याओं पर विचार करना तथा बहुविषयी विद्वत संवाद को आगे बढ़ाना था।

सम्मेलन की संकल्पना आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी द्वारा सिंधु-सरस्वती सभ्यता के व्यापक सभ्यतागत दृष्टिकोण से प्रेरित थी, जिसमें उन्होंने इस सभ्यता की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को बहुआयामी एवं साक्ष्यों पर आधारित दृष्टिकोण से समझने और परखने की आवश्यकता पर बल दिया। इस संदर्भ में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने पाणिनि और शलातुर के संदर्भ से प्राचीन भारतीय सभ्यता और आधुनिक राष्ट्र-राज्य की सीमाओं के बीच अंतर को रेखांकित किया। उनका मानना है कि पाणिनि का जन्मस्थान शलातुर आज पाकिस्तान में है, लेकिन उनके समय भारत और पाकिस्तान जैसे आधुनिक राष्ट्र-राज्य और उनकी वर्तमान राजनीतिक सीमाएं अस्तित्व में नहीं थीं। पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ केवल संस्कृत व्याकरण की असाधारण कृति नहीं, बल्कि उस व्यापक भारतीय बौद्धिक संसार की साक्षी है, जिसमें भाषा, दर्शन, शिक्षा और ज्ञान की अनेक परम्पराएं विकसित हुईं। उनके अनुसार, पाणिनि को केवल वर्तमान राजनीतिक भूगोल के आधार पर देखना उनके व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ को सीमित करना होगा।

इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में डेक्कन कॉलेज, पुणे के पूर्व कुलपति प्रो. वसंत शिंदे, असम विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर आर्कियोलॉजी एंड म्यूज़ियोलॉजी के निदेशक प्रो. आलोक त्रिपाठी, इंडिका के पूर्व कुलपति प्रो. नागराज पातुरी, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के अपर महानिदेशक डॉ. संजय कुमार मंजुल, पुरातत्त्वविद् डॉ. करुणा शंकर शुक्ल और हड़प्पा अभिलेख विशेषज्ञ डॉ. पुनीत गुप्ता और राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्रण मिशन के मिशन निदेशक डॉ. मयंक शेखर ने भी अपने विचार रखे। सम्मेलन का मार्गदर्शन भारत विद्या प्रयोजना के विभागाध्यक्ष प्रो. ए.बी. शुक्ल, शहीद भगत सिंह महाविद्यालय (सांध्य) के प्राचार्य प्रो. अरुण कुमार अत्रि तथा आयोजन का समन्वय डॉ. निधि मिश्रा ने किया। इस सम्मेलन में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक प्रो. यदुबीर सिंह रावत की भी गरिमामय उपस्थिति रही। उन्होंने इस विषय पर विद्वानों के बीच सार्थक संवाद की महत्ता को रेखांकित किया।

प्रो. आलोक त्रिपाठी ने हड़प्पा सभ्यता के नामकरण, खोज और औपनिवेशिक व्याख्याओं पर पुनर्विचार की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने 1921 में रायबहादुर दयाराम साहनी द्वारा हड़प्पा की खुदाई और उनके योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि इतिहास-लेखन में इस भूमिका को अपेक्षित स्थान नहीं मिला। उन्होंने ‘सिंधु सभ्यता’ जैसे प्रचलित नामकरण, ‘ग्रेट बाथ’ और ‘प्रिस्ट किंग’ जैसी शब्दावलियों तथा औपनिवेशिक दौर में विकसित कुछ व्याख्याओं के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता बताई। उनका आग्रह था कि हड़प्पा सभ्यता से जुड़े निष्कर्षों को प्राथमिक प्रमाणों के आधार पर नए सिरे से परखा जाए और पुरातात्त्विक साक्ष्यों को भारतीय साहित्य, भाषा और सांस्कृतिक परम्पराओं के साथ जोड़कर देखा जाए।

प्रो. वसंत शिंदे ने अपने उत्खनन-आधारित दृष्टिकोण से कहा कि पुरातात्त्विक सामग्री को अलग-अलग वस्तुओं के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक संदर्भ में समझना चाहिए। उत्खनन से निवास-व्यवस्था, तकनीक, शिल्प उत्पादन, व्यापार और दैनिक जीवन की तस्वीर सामने आती है। बनावली और राखीगढ़ी जैसे स्थलों के संदर्भ में स्थापत्य और भौतिक संस्कृति में दिखाई देने वाली निरंतरताओं तथा धोलावीरा की संरचनात्मक विशेषताओं पर भी चर्चा हुई।

डॉ. करुणा शंकर शुक्ल ने सिंधु-सरस्वती सभ्यता को व्यापक वैदिक और भारतीय सभ्यता के संदर्भ में देखने की आवश्यकता बताई। उन्होंने पुरातात्त्विक साक्ष्यों, वैदिक परम्परा और प्राचीन भारतीय साहित्य को साथ रखकर अध्ययन करने पर बल दिया। उन्होंने सिंधु लिपि, पुरानी ब्राह्मी, संस्कृत और वैदिक साहित्य के बीच संभावित सम्बंधों पर चर्चा की तथा विभिन्न स्थलों से प्राप्त मुहरों, सीलिंग और अन्य पुरावशेषों की कुछ ऐसी व्याख्याओं का उल्लेख किया, जिनमें उन्हें भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों से सम्बंध दिखाई देता है। उन्होंने बी. बी. लाल के कथन—‘पुरातत्त्व और परम्परा को साथ-साथ चलना चाहिए’—का उल्लेख करते हुए कहा कि सिंधु-सरस्वती परम्परा को भारतीय सभ्यता के दीर्घकालिक विकासक्रम से जोड़कर देखने की आवश्यकता है। साथ ही, उनके द्वारा प्रस्तुत लिपिपाठ और वैदिक ग्रंथों से जुड़े निष्कर्ष स्वतंत्र प्रमाण-परीक्षण और आगे के शोध की अपेक्षा रखते हैं।

डॉ. संजय कुमार मंजुल ने अपने संबोधन में कहा कि ‘हड़प्पा का अंत नहीं हुआ, बल्कि उसका रूप बदला।’ उन्होंने पुरातात्त्विक साक्ष्यों, नदियों के बदलाव और साहित्यिक संदर्भों के आधार पर परिपक्व हड़प्पा और बाद के सांस्कृतिक चरणों को केवल अलग-अलग कालखंडों में देखने के बजाय उनके बीच संभावित सम्बंधों और समकालिकताओं पर विचार करने की आवश्यकता बताई।

प्रो. नागराज पातुरी ने प्राचीन और वर्तमान के बीच जीवित शिल्प परम्पराओं को एक महत्त्वपूर्ण कड़ी बताया। उन्होंने मनका बनाने और रंगाई जैसी पारंपरिक प्रक्रियाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि आज भी प्रचलित शिल्प-विधियां उत्खनन से प्राप्त प्राचीन भौतिक संस्कृति को समझने में उपयोगी हो सकती हैं।

डॉ. पुनीत गुप्ता ने हड़प्पा लिपि के अध्ययन पर अपने विचार रखते हुए कहा कि लिपि के संकेतों को केवल अलग-अलग प्रतीकों के अर्थ के आधार पर नहीं समझा जा सकता। संकेतों के बार-बार आने वाले क्रम, उनकी स्थिति, लिखने की दिशा और संरचनात्मक व्यवस्था का भी अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने अपने प्रस्तावित ‘बीएपी मॉडल’ का उल्लेख करते हुए अभिलेख-विज्ञान, भाषाविज्ञान और विश्लेषणात्मक विधियों के साथ कंप्यूटेशनल तथा सांख्यिकीय तकनीकों को जोड़कर हड़प्पा लिपि के अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया।

सम्मेलन के संयोजक प्रो. ए. बी. शुक्ल ने कहा कि गोलमेज का उद्देश्य सिंधु-सरस्वती सभ्यता को पुरातात्त्विक, ऐतिहासिक, भाषाई और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर समझना है। साथ ही, बाद की भारतीय परम्पराओं के साथ दिखाई देने वाली सांस्कृतिक और सभ्यतागत निरंतरताओं, सिंधु लिपि की प्रकृति एवं संरचना और उसके पाठ को समझने के प्रयासों पर गंभीर विचार करना भी इसका उद्देश्य है। उन्होंने बहुविषयी शोध और इतिहासकारों, पुरातत्त्वविदों, भाषाविदों तथा अभिलेखविदों के बीच सार्थक संवाद को इस पहल का महत्त्वपूर्ण पक्ष बताया।

कुल मिलाकर, सम्मेलन ने यह रेखांकित किया कि सिंधु-सरस्वती सभ्यता का अध्ययन अब केवल पुरातात्त्विक स्थलों और पुरावशेषों की व्याख्या तक सीमित नहीं है। सभ्यता, पर्यावरण, तकनीक, शिल्प, सामाजिक संरचना, भाषा, लिपि, सांस्कृतिक अंतःक्रियाओं और परम्पराओं की निरंतरता जैसे अनेक आयामों को साथ रखकर इसके अध्ययन की आवश्यकता है। विभिन्न मतों और दृष्टिकोणों के बावजूद सम्मेलन का साझा आधार प्रमाणों की पुनःजांच, नए शोध और बहुविषयी संवाद रहा। इसी उद्देश्य से विद्वानों, शोधकर्ताओं और प्रतिभागियों के बीच विचार-विनिमय हुआ तथा सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए।

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