आईजीएनसीए में हरेन्द्र प्रताप की पुस्तक ‘सेकुलरवाद और बदलती जनगणना के आंकड़े’ का लोकार्पण

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के कलानिधि विभाग द्वारा हरेन्द्र प्रताप की पुस्तक ‘सेकुलरवाद और बदलती जनगणना के आंकड़े’ के लोकार्पण और चर्चा सत्र का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के अध्यक्ष  रामबहादुर राय ने की। छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका मुख्य अतिथि, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आम्बेकर मुख्य वक्ता तथा पिछड़ा वर्ग उप-वर्गीकरण जांच आयोग के सदस्य डॉ. जतिंदर कुमार बजाज विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। धन्यवाद ज्ञापन आईजीएनसीए के कलानिधि प्रभाग के अध्यक्ष प्रो. के. अनिल कुमार ने किया।

राजीव तुली, रामबहादुर राय, सुनील आम्बेकर, रमेन डेका, डॉ. जतिंदर बजाज और हरेंद्र प्रताप पुस्तक का विमोचन करते हुए
Written By : डेस्क | Updated on: September 30, 2026 11:55 am

छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका ने कहा कि देश में जनगणना और जनसंख्या संरचना को लेकर गंभीर विमर्श की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जाती रही है। उन्होंने पूर्वोत्तर भारत में हुए जनसांख्यिकीय बदलावों का उल्लेख करते हुए कहा कि जनसंख्या में होने वाले परिवर्तन का व्यापक प्रभाव पड़ता है। उनके अनुसार, जनसांख्यिकीय बदलावों को समझने के लिए जनसंख्या के आंकड़ों का गंभीर अध्ययन आवश्यक है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए रामबहादुर राय ने कहा कि जनसंख्या से जुड़े विषयों पर केवल अनुमान या धारणाओं के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध आंकड़ों और तथ्यों के आधार पर गंभीर विमर्श होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जनसंख्या संबंधी बदलावों से जुड़ी चुनौतियों की जानकारी भारत सरकार को है और इस दिशा में कार्य किया जा रहा है।

सुनील आंबेकर ने कहा कि असम आंदोलन ने देश के सामने जनसांख्यिकीय बदलावों से जुड़े सवालों को प्रमुखता से रखा था। उन्होंने कहा कि उस समय असम से उठी आवाज को केवल एक राज्य की समस्या के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय संदर्भ में समझने की आवश्यकता थी। उन्होंने भारतीय इतिहास के विभिन्न कालखंडों में जनसंख्या और सामाजिक संरचना में हुए बदलावों का उल्लेख करते हुए कहा कि जनसांख्यिकी का प्रश्न देश की सामाजिक संरचना और अखंडता से जुड़ा हुआ विषय है। उन्होंने स्वतंत्रता से पहले और बाद की राजनीति में जनसंख्या संबंधी प्रश्नों पर हुए विमर्श का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा, देश की डेमोग्राफी देश की अखंडता से जुड़ा हुआ मुद्दा है।

डॉ. जतिंदर कुमार बजाज ने जनसंख्या के दीर्घकालिक आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि जनसांख्यिकीय परिवर्तन को केवल आंकड़ों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसके सामाजिक और सभ्यतागत आयामों पर भी विचार आवश्यक है। उन्होंने जनसंख्या वृद्धि, प्रजनन दर और विभिन्न समुदायों की जनसंख्या संरचना में आए बदलावों को समझने की आवश्यकता पर बल दिया।

पुस्तक की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए सुरुचि प्रकाशन के अध्यक्ष राजीव तुली ने कहा कि पुस्तक में जनगणना के आंकड़ों के माध्यम से देश में जनसंख्या की बदलती संरचना और उसके सामाजिक प्रभावों पर चर्चा की गई है। उन्होंने कहा कि पुस्तक इस विषय को राष्ट्रीय संदर्भ में देखने का प्रयास करती है।

लेखक हरेन्द्र प्रताप ने कहा कि पुस्तक में उन्होंने मुख्य रूप से जनसंख्या के आंकड़ों को प्रस्तुत किया है और इसे पांच खंडों में विभाजित किया गया है। उनके अनुसार, पुस्तक का उद्देश्य विभिन्न कालखंडों के जनसंख्या संबंधी आंकड़ों को सामने रखकर देश में हुए जनसांख्यिकीय परिवर्तनों को समझने का प्रयास करना है। उन्होंने असम और पश्चिम बंगाल सहित विभिन्न क्षेत्रों के जनसंख्या संबंधी बदलावों का उल्लेख करते हुए अपने विचार रखे।

कार्यक्रम के अंत में प्रो. के. अनिल कुमार ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और उपस्थित जनों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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