नई दिल्ली: वर्क-लाइफ बैलेंस पर चल रही बहस के बीच, अडानी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अडानी ने इस विषय पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि वर्क-लाइफ बैलेंस का अनुभव तब होता है जब व्यक्ति वह काम करता है जो उसे पसंद हो।
वर्क-लाइफ बैलेंस को परिभाषित करना व्यक्तिगत मामला
समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में गौतम अडानी ने कहा, “आपका वर्क-लाइफ बैलेंस मुझ पर थोपा नहीं जाना चाहिए और मेरा बैलेंस आप पर नहीं थोपा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति चार घंटे परिवार के साथ बिताता है और उसमें खुशी महसूस करता है, या कोई आठ घंटे परिवार के साथ बिताकर खुश है, तो वही उसका बैलेंस है। लेकिन अगर आप आठ घंटे बिताते हैं, तो बीवी भाग जाएगी।”
अडानी ने स्पष्ट किया कि वर्क-लाइफ बैलेंस की असली खूबसूरती व्यक्ति की अपनी खुशी और उसके प्रियजनों की संतुष्टि में होती है।
जीवन की सादगी पर जोर
अडानी ने कहा, “आपका वर्क-लाइफ बैलेंस तभी सटीक होता है जब आप वही करते हैं जो आपको पसंद हो। हमारे लिए यह या तो परिवार है या काम। हमारे पास इन दोनों के बाहर की कोई दुनिया नहीं है। हमारे बच्चे भी यही देखते हैं और इससे सीखते हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “कोई भी व्यक्ति यहां स्थायी रूप से नहीं आया है। जब कोई इस सत्य को स्वीकार करता है, तो जीवन सरल हो जाता है।”
वर्क वीक और वर्क-लाइफ बैलेंस पर चल रही बहस
हाल के दिनों में, 70 घंटे के वर्क वीक को लेकर बहस ने जोर पकड़ा है। जहां कुछ लोग लंबे काम के घंटों का समर्थन करते हैं, वहीं कुछ इसे निजी जीवन में हस्तक्षेप मानते हैं।
गौतम अडानी का यह बयान वर्क-लाइफ बैलेंस को लेकर एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है। उन्होंने इस बहस को एक नई दिशा देते हुए कहा कि खुशी और संतुलन का सही अर्थ व्यक्ति विशेष के अनुभव और प्राथमिकताओं में निहित होता है।
यह बयान न केवल कार्यक्षेत्र में अधिक व्यस्त व्यक्तियों बल्कि उनके परिवारों के लिए भी विचारणीय है।
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