रविवार विशेष : हिन्दी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म है Mother India

कुछ समय पहले मैंने अपने फ़ेसबुक समूह फिल्म समीक्षा पर एक सर्वेक्षण कराया था, जिसमें लोगों से पूछा गया था कि उनकी नज़र में अब तक की सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म कौन है और इस सर्वेक्षण में 10 हिंदी फिल्मों को शामिल किया गया था तथा उत्तर देने वालों को अपने पसंद की कोई दूसरी फिल्म जोड़ने का विकल्प भी दिया गया था। इस सर्वेक्षण में 75 प्रतिशत से अधिक लोगों ने मदर इण्डिया को भारत की अब तक की सर्वश्रेष्ठ फिल्म चुना था।

Written By : प्रो. पुनीत बिसारिया | Updated on: November 5, 2024 1:48 pm

Mother India

विकीपीडिया के सर्वेक्षण के मुताबिक भी आज तक सर्वाधिक देखी जाने वाली 5 फिल्मों की सूची में मदर इण्डिया, किस्मत, मुग़ल ए आज़म, शोले और हम आपके हैं कौन शामिल हैं। महबूब खान निर्देशित सन 1957 में आयी यह फिल्म वास्तव में महबूब खान की सन 1940 की फिल्म औरत का रीमेक थी ।

Mother India फिल्म का नाम कैथरीन मेयो की सन 1927 में आयी पुस्तक मदर इण्डिया से से लिया गया था। इस पुस्तक में भारतीय समाज पर गहरे प्रहार किये गए थे और उनके आरोपों का उत्तर देने के लिए ही लाला लाजपत राय ने दुखी भारत शीर्षक से एक पुस्तक लिखी थी और भारतीयों पर लगाये गए आरोपों का सटीक उत्तर दिया था।

कैथरीन की इस पुस्तक की आलोचना महात्मा गाँधी ने भी यह कहते हुए की थी कि मेयो ड्रेन इन्स्पेक्टर का काम कर रही हैं और किसी के इशारे पर भारत की गंदगी को अतिशयोक्ति पूर्ण ढंग से दुनिया के सामने रख रही हैं। यही कारण था कि उस समय इस किताब की प्रतियाँ सार्वजनिक जगहों पर जलाई गयी थीं।

इसलिये जब महबूब ने यह नाम रखने का निर्णय लिया तो सबसे पहले उन्होंने विवादों से बचने के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय तथा विदेश मंत्रालय से अनुमति प्राप्त करने हेतु सन 1952 में पत्र लिखे, लेकिन सूचना और प्रसारण मंत्रालय तथा विदेश मंत्रालय को लगा कि यह फिल्म कैथरीन मेयो की विवादित पुस्तक पर आधारित होगी और इसलिए उन्होंने इस नाम को अनुमति देने से साफ इंकार कर दिया।

17 सितम्बर, सन 1955 को महबूब ने दोबारा लिखे अपने पत्र में यह स्पष्ट कर दिया कि Mother India फिल्म का कैथरीन मेयो की पुस्तक से कोई लेना देना नहीं है और तब उन्हें यह नाम इस्तेमाल करने के लिए हरी झंडी मिल गयी।

इसके बाद औरत फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने वाले वजाहत मिर्ज़ा से इसे नए रूप में लिखने को कहा गया। महबूब इस फिल्म को आजादी की 10वीं वर्षगांठ पर 15 अगस्त सन 1957 को रिलीज़ करना चाहते थे लेकिन यह फिल्म इसके दो महीने बाद 25 अक्तूबर, सन 1957 को रिलीज़ हो सकी।

तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु तथा श्रीमती इंदिरा गाँधी के लिए राष्ट्रपति भवन में इसका स्पेशल शो रखा गया।

यह फिल्म सन 1990 तक अर्थात 40 से अधिक सालों तक एक थियेटर में चलती रही थी, जो एक रिकार्ड है। इस फिल्म को भारत की सर्वाधिक प्रशंसित फिल्म का गौरव हासिल है। यह उस समय की ब्लॉकबस्टर फिल्म थी। इसे अकेडमी अवार्ड के लिए विदेशी भाषा की फिल्म की श्रेणी में नामित किया गया था।

वास्तव में यह फिल्म स्वतंत्रता के बाद के ग्रामीण भारत का जीवंत दस्तावेज है और गोदान के बाद भारतीय किसान की विवशता को यदि कोई वाणी दे सका तो वह यह फिल्म थी। इस फिल्म में 26 साल की नर्गिस ने युवा से लेकर वृद्धा तक के अभिनय को जिस प्रभावशाली ढंग से परदे पर उतारा था, वह आज भी अतुलनीय है।

उस समय फिल्म मैगजीन फिल्म इण्डिया के सम्पादक बाबूराव पटेल ने इसे भारतीय सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म कहा था। सीएनएन आईबीएन के राजीव मसंद ने इस फिल्म के लिए लिखा है कि इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा को वैश्विक परिदृश्य पर स्थापित किया और आने वाले कई दशकों तक यह फिल्म विश्व की नज़र में भारत की सर्वश्रेष्ठ फिल्म बनी हुई थी।

इण्डिया टाइम्स ने मरने से पहले एक बार ज़रूर देखने वाली 1001 फिल्मों में हिन्दी से केवल मदर इण्डिया और दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे को स्थान दिया है। बाद में आयी कई फिल्मों पर मदर इण्डिया का साफ़ प्रभाव देखा जा सकता है।

अमिताभ अभिनीत दीवार में ‘ मेरे पास माँ है’ संवाद इस फिल्म से प्रभावित था। इसी प्रकार ‘ क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ टीवी सीरियल में राधा अर्थात नर्गिस द्वारा अपने पुत्र को गोली मारने का दृश्य पुनर्जीवित किया गया था और इसे सन 2004 के दर्शकों ने भी उतने ही उत्साह के साथ देखा था। मदर इंडिया में कन्हैयालाल ने सुखीलाल के अभिनय में जान फूंकी थी तो सुनीलदत्त का बिरजू एवं राजकुमार का शामू का किरदार भी जीवंत प्रतीत होता है।

नौशाद का संगीत इस फिल्म के दृश्यों हेतु बेहद सटीक था और इसके गीतों ने भी फिल्म जगत में धूम मचा दी थी और आज भी इसके गीतों घूँघट नहीं खोलूँगी सैयां तोरे आगे, नगरी नगरी द्वारे द्वारे, दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा, दुःख भरे दिन बीते रे भैया, ओ गाड़ी वाले, होली आयी रे कन्हाई, ना मैं भगवान् हूँ और पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली को लोग गुनगुनाते मिल जायेंगे। ऐसी फ़िल्में रोज़ रोज़ नहीं बनतीं। यूँ तो महबूब खान ने कई यादगार फ़िल्में बनाईं, लेकिन यह फिल्म बनाकर ही वे विश्व सिनेमा के इतिहास में अमर हो गए हैं।

प्रो. पुनीत बिसारिया बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी में हिंदी के प्रोफेसर हैं और फिल्मों पर लिखने के लिए जाने जाते हैं। वे  द फिल्म फाउंडेशन ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं तथा गोल्डेन पीकॉक इंटरनेशनल फिल्म प्रोडक्शंस एलएलपी के नाम के फिल्म प्रोडक्शन हाउस के सीईओ हैं।)

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