इस विषय पर प्रमुख इतिहासकार डॉ. चित्रा माधवन ने महत्त्वपूर्ण जानकारियां प्रदान कीं। स्वागत एवं परिचय भाषण आईजीएनसीए के कल्चरल इन्फॉर्मेटिक्स लैब (सीआईएल) के निदेशक के प्रो. (डॉ.) प्रतापनंद झा ने दिया। इस अवसर पर भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय की सचिव सुश्री वी. विद्यावती ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि हमें अपनी विरासत को संभालना होगा और इसके बारे में युवा पीढ़ी को शिक्षित करना होगा।
व्याख्यान की वक्ता चित्रा माधवन ने अपने संबोधन का प्रारम्भ इस बात से किया कि प्राचीन भारत से लेकर मध्यकालीन भारत तक, यहां तक कि उसके बाद भी, संस्कृत पूरे तमिलनाडु की लोक व्यवहार की भाषा थी। उन्होंने चोल, पल्लव, पांड्य, विजयनगर साम्राज्य के राजाओं द्वारा 7वीं शताब्दी से 17वीं शताब्दी तक तमिलनाडु के मंदिरों में ‘ग्रंथ लिपि’ में उत्कीर्ण कराए गए संस्कृत अभिलेखों का हवाला देते हुए यह बात कही। उन्होंने भगवान शिव, विष्णु, ब्रहमा, देवी मंदिरों के अलावा, गणेश जी और 17वीं शताब्दी के पहले संभवतः तमिलनाडु में एकमात्र हनुमान मंदिर का संदर्भ देते हुए कहा कि दक्षिण और उत्तर के शासकों में सम्बंध थे। उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत पल्लव राजा महेंद्रवर्मन प्रथम द्वारा सातवीं शताब्दी में निर्मित एक गुफा मंदिर के संस्कृत अभिलेख से की।
महेंद्रवर्मन (600-630 ई.) एक पल्लव सम्राट थे, जिन्होंने 7वीं शताब्दी की शुरुआत में वर्तमान आंध्र क्षेत्र के दक्षिणी भागों और वर्तमान तमिलनाडु के उत्तरी क्षेत्रों पर शासन किया था। वह एक विद्वान, एक चित्रकार, एक वास्तुकार और एक संगीतकार थे।
डॉ. चित्रा माधवन ने कहा कि हम ओडिशा के कोणार्क के सूर्य मंदिर, कश्मीर के मार्तण्ड सूर्य के सूर्य मंदिर और गुजरात के मोढेरा सूर्य मंदिर के बारे में जानते हैं, ये काफी प्रसिद्ध हैं। लेकिन शायद ही लोगों को पता होगा कि तमिलनाडु में कुम्भकोणम् के पास भी एक सूर्य मंदिर है- सूर्यनार कोविल सूर्य मंदिर।
गौरतलब है कि कुम्भकोणम् चोल राजाओं के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण नगर था। चोलों द्वारा बनवाए गए इस मंदिर के नाम पर ही गांव का नाम सूर्यनार कोविल पड़ा। यहां भी एक संस्कृत अभिलेख है, जिससे पता चलता है कि इस मंदिर का निर्माण संभवतः कन्नौज के शासकों के दान से हुआ। इससे सिद्ध होता है कि दोनों राज्यों के शासकों में अच्छे सम्बंध थे। उन्होंने काञ्चीपुरम् के पास स्थित अयंगरकुलम् मंदिर के संस्कृत अभिलेख का जिक्र भी किया। यहां एक बड़ा तालाब भी है। इस मंदिर का निर्माण कोटिकन्यादनम लक्ष्मीकुमार ताताचार्य ने करवाया था। वे विजयनगर सम्राट वेंकट राय द्वितीय (1586-1614 ई.) के राजगुरु) थे।
डॉ. चित्रा माधवन ने तमिलनाडु के एन्नायिरम स्थित मंदिर के एक तमिल अभिलेख का भी जिक्र किया, जिसमें संस्कृत शब्दों की भरमार है। इससे पता चलता है कि यहां वैदिक महाविद्यालय का संचालन होता था और परिसर में छात्रावास भी थे। इस अभिलेख में छात्रों की संख्या, शिक्षकों की संख्या, विषयों की संख्या, शिक्षकों को दिए जाने वाले वेतन, छात्रों की दी जाने वाली छात्रवृत्ति के बारे में बताया गया है। इसे चोलों ने बनवाया था। संभवत यह विश्वविद्यालय था। वहीं एक दूसरे मंदिर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उसके संस्कृत अभिलेख से ज्ञात होता है कि मंदिर से जुड़ा एक महाविद्यालय था, छात्रावास था और छात्रों का उपचार करने के लिए एक अस्पताल भी था। वहां तीस आयुर्वेदिक औषधियां होती थीं और बीमार छात्रों की देखभाल के लिए नर्सें थीं।
उन्होंने कैलाथनाथ मंदिर का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि चोल राजाओं ने वैदिक गुरुकुल शुरू किये थे। उत्तर और तमिलनाडु के राजवंशों के बीच वैवाहिक सम्बंध भी थे। उन्होंने बात का समापन करते हुए कहा कि संस्कृत भाषा पूर्व से पश्चिम तक, उत्तर से दक्षिण तक पूरे तमिलनाडु में प्रचलित थी। ग्रंथ लिपि में संस्कृत भाषा लिखी जाती थी। मंदिरों के संस्कृत अभिलेख हमें मूर्तिशिल्प, वास्तुकला के विकास को समझने में मदद करते हैं।
डॉ. कपिला वात्स्यायन के बारे में
डॉ. कपिला वात्स्यायन (1928-2020) आईजीएनसीए की संस्थापक सदस्य सचिव रहीं और कला के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हुई। उन्हें पद्म विभूषण और साहित्य कला परिषद् के लाइफटाइम अचीवमेंट जैसे अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। वे भारत सरकार में भी कई महत्त्वपूर्ण पदों पर रहीं। उन्होंने अपनी 14,000 से अधिक पुस्तकों और 3,000 से अधिक दुर्लभ पत्रिकाओं का संग्रह आईजीएनसीए को प्रदान किया है।
डॉ. चित्रा माधवन के बारे में
डॉ. चित्रा माधवन प्राचीन इतिहास और पुरातत्त्व की विशेषज्ञ हैं। उन्होंने संस्कृत और मंदिर वास्तुकला पर कई महत्वपूर्ण किताबें लिखी हैं। उनका शोध विशेष रूप से दक्षिण भारत के मंदिरों और संस्कृत शिलालेखों पर केंद्रित है।
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