बशीर बद्र के जाने के साथ ही उर्दू ग़ज़ल का वह दौर मानो खत्म हो गया, जिसने मुश्किल और भारी-भरकम उर्दू को आम आदमी की भाषा बना दिया था। मुशायरों से लेकर संसद तक, प्रेमियों की डायरी से लेकर सोशल मीडिया तक—बशीर बद्र के शेर हर दौर में लोगों की जुबान पर रहे। गीतकार जावेद अख्तर ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि “आज हमारी भाषा उर्दू थोड़ी और गरीब हो गई।”
सात साल की उम्र में लिखी पहली नज़्म
15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या (तत्कालीन फैजाबाद) में जन्मे सैयद मोहम्मद बशीर ने बहुत छोटी उम्र में शायरी शुरू कर दी थी। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उन्होंने एमए और पीएचडी की पढ़ाई की और बाद में वहीं उर्दू के प्राध्यापक बने।
उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा सदमा 1987 के मेरठ दंगों में मिला, जब उनका घर जल गया। हजारों किताबें, पांडुलिपियां और वर्षों की साहित्यिक पूंजी आग में राख हो गई। लेकिन इस त्रासदी ने उनकी शायरी को और गहरा बना दिया। बाद में वे भोपाल आकर बस गए।
ग़ज़लों में मोहब्बत भी, समय का दर्द भी
बशीर बद्र उन शायरों में थे जिन्होंने ग़ज़ल को सिर्फ महबूब की जुल्फों से निकालकर समाज, टूटते रिश्तों और इंसानी संवेदनाओं से जोड़ा। उनकी शायरी में दर्द भी था, नर्मी भी और जिंदगी का दर्शन भी।
उनका मशहूर शेर—
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में…”
मेरठ दंगों के बाद देश की साम्प्रदायिक राजनीति पर सबसे मार्मिक टिप्पणी माना जाता है।
साहित्य की दुनिया में अमिट पहचान
बशीर बद्र के कई ग़ज़ल संग्रह बेहद चर्चित रहे। इनमें “आस”, “इकाई”, “आमद”, “आहट”, “इमेज” और “कुल्लियात-ए-बशीर बद्र” प्रमुख हैं। उनका संग्रह “आस” उर्दू ग़ज़लों के महत्वपूर्ण संग्रहों में माना जाता है और इसी के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। “कुल्लियात-ए-बशीर बद्र” भारत ही नहीं, पाकिस्तान में भी बेहद लोकप्रिय रहा। उन्होंने आलोचना और शोध पर भी काम किया। “आज़ादी के बाद उर्दू ग़ज़ल का तनक़ीदी मुताला” और “बीसवीं सदी में ग़ज़ल” जैसी पुस्तकें उर्दू साहित्य के गंभीर अध्येताओं के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
सम्मान और लोकप्रियता
बशीर बद्र को 1999 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार समेत अनेक राष्ट्रीय सम्मान मिले।
उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जाता है कि उनके शेर संसद में नेताओं द्वारा उद्धृत किए जाते रहे। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने शिमला समझौते के दौरान पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के सामने उनका मशहूर शेर पढ़ा था—
“दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।”
यादों में हमेशा रहेंगे ये शेर
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए…”
“कुछ तो मजबूरियां रही होंगी,
यूं ही कोई बेवफा नहीं होता…”
“शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है,
जिस शाख पर बैठे हो वो टूट भी सकती है…”
“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो…”
“मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला,
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला…”
आखिरी दिनों में भूलने लगे थे अपने ही शेर
जिंदगी के अंतिम वर्षों में डिमेंशिया ने उनकी याददाश्त को कमजोर कर दिया था। करीबी लोगों के मुताबिक कई बार वे अपने ही मशहूर शेर सुनकर पूछ बैठते थे—“यह किसने लिखा?” लेकिन विडंबना यह रही कि जो शायर खुद बहुत कुछ भूलने लगा था, उसे दुनिया कभी नहीं भूल पाएगी। बशीर बद्र अब इस दुनिया में नहीं हैं, मगर उनकी ग़ज़लें आने वाली पीढ़ियों के दिलों में हमेशा गूंजती रहेंगी।
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